पराली जलाने की घटनाओं पर केंद्र सख्त, मध्य प्रदेश और राजस्थान में बढ़े मामले। जानें 3.54 लाख मशीनों, 4,200 करोड़ के बजट और नए निर्देशों की पूरी खबर।
खेतों में पराली जलाने की घटनाओं को रोकने के लिए सरकारी स्तर पर लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। किसानों को फसल अवशेष प्रबंधन की मशीनें उपलब्ध कराने से लेकर वित्तीय सहायता देने तक कई योजनाएं चलाई जा रही हैं। इसके बावजूद पराली जलाने की घटनाएं पूरी तरह थम नहीं रही हैं। मध्य प्रदेश और राजस्थान में सामने आए बढ़ते मामलों ने सरकारी प्रयासों और प्रशासनिक निगरानी की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
इसी मुद्दे पर केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान और केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने 13 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली में उच्चस्तरीय बैठक की। बैठक में राज्यों को पराली प्रबंधन के लिए युद्धस्तर पर काम करने के निर्देश दिए गए। साथ ही जिला कलेक्टरों को गांवों का दौरा करने, निगरानी व्यवस्था मजबूत बनाने और स्थानीय स्तर पर ठोस कार्ययोजना तैयार करने को कहा गया।
मध्य प्रदेश और राजस्थान में बढ़ीं पराली जलाने की घटनाएं
बैठक में पेश किए गए आंकड़ों के अनुसार, 15 सितंबर से 12 अक्टूबर 2026 की अवधि में पिछले साल के मुकाबले हरियाणा में पराली जलाने की घटनाओं में 53.3 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई। उत्तर प्रदेश में भी ऐसी घटनाएं करीब 32 प्रतिशत घटीं।
हालांकि, मध्य प्रदेश और राजस्थान में पराली जलाने की घटनाओं में बढ़ोतरी को लेकर चिंता जताई गई। उपलब्ध विवरण में इन दोनों राज्यों में वृद्धि का सटीक प्रतिशत नहीं बताया गया है।
इन आंकड़ों से संकेत मिलता है कि पराली प्रबंधन को लेकर राज्यों के बीच स्थिति एक जैसी नहीं है। ऐसे में स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार रणनीति तैयार करना और जिला स्तर पर निगरानी बढ़ाना जरूरी हो गया है।
3.54 लाख मशीनें और 4,200 करोड़ रुपये खर्च, फिर भी चुनौती बरकरार
केंद्र सरकार के अनुसार, फसल अवशेषों के प्रबंधन के लिए राज्यों को अब तक 3.54 लाख से अधिक मशीनें उपलब्ध कराई जा चुकी हैं। इसके अतिरिक्त, पिछले आठ वर्षों में पराली प्रबंधन योजना के तहत लगभग 4,200 करोड़ रुपये जारी किए गए हैं।
इसके बावजूद किसानों के सामने कई व्यावहारिक समस्याएं बनी हुई हैं। इनमें जरूरत के समय मशीनों का उपलब्ध न होना, खराब मशीनों की मरम्मत में देरी और छोटे किसानों को किफायती दरों पर कृषि उपकरण नहीं मिलना शामिल है।
केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि खराब पड़ी मशीनों को जल्द से जल्द चालू किया जाए। उन्होंने कस्टम हायरिंग सेंटरों के माध्यम से छोटे किसानों को सस्ती दरों पर मशीनें उपलब्ध कराने पर भी जोर दिया।
मंत्री का स्पष्ट संदेश था कि सरकारी योजनाओं के तहत दी गई मशीनों का वास्तविक उपयोग खेतों में होना चाहिए, न कि उनका रिकॉर्ड केवल सरकारी दस्तावेजों तक सीमित रह जाए।
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पराली जलाने की घटनाओं में अधिकारियों की जवाबदेही पर सवाल
पराली प्रबंधन के लिए पर्याप्त बजट और मशीनें उपलब्ध कराने के बावजूद कई क्षेत्रों में घटनाएं जारी रहना प्रशासनिक व्यवस्था के सामने चुनौती है। ऐसे में यह देखना जरूरी है कि सरकारी योजनाओं का लाभ किसानों तक समय पर पहुंच रहा है या नहीं।
क्या गांवों में फसल कटाई से पहले ही पराली प्रबंधन की तैयारी पूरी कर ली गई थी? क्या किसानों को मशीनें उचित समय पर मिल सकीं? क्या स्थानीय अधिकारियों ने खेतों का नियमित निरीक्षण किया? इन सवालों के जवाब पराली जलाने की समस्या से निपटने की दिशा में महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
प्रभावी रोकथाम के लिए केवल निर्देश जारी करना पर्याप्त नहीं होगा। जिला प्रशासन को योजनाओं के क्रियान्वयन की निगरानी करने और जरूरत पड़ने पर कमियों को दूर करने के लिए समयबद्ध कदम उठाने होंगे।
उपग्रह निगरानी के साथ खेतों में भी बढ़ेगी गश्त
केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने निगरानी व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि पराली जलाने की घटनाओं का पता लगाने के लिए केवल उपग्रह से प्राप्त आंकड़ों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए।
बैठक में दोपहर तीन बजे के बाद उपग्रह निगरानी में आने वाले अंतराल को ध्यान में रखते हुए जमीनी स्तर पर गश्त बढ़ाने और विशेष निगरानी दल तैनात करने के निर्देश दिए गए।
इस कदम का उद्देश्य उन घटनाओं की पहचान करना है, जिनका पता नियमित निगरानी के दौरान समय पर नहीं चल पाता। स्थानीय प्रशासन और निगरानी दलों के बीच बेहतर समन्वय से कार्रवाई में तेजी लाने में मदद मिल सकती है।
पराली को कचरा नहीं, कमाई का जरिया बनाने पर जोर
पराली जलाने की समस्या का स्थायी समाधान केवल प्रतिबंध और निगरानी से संभव नहीं है। किसानों को फसल अवशेषों के निपटान के लिए ऐसे विकल्प भी उपलब्ध कराने होंगे, जो किफायती होने के साथ आर्थिक रूप से फायदेमंद हों।
केंद्रीय कृषि मंत्री ने पराली के इस्तेमाल से जैविक खाद, पशु चारा, बिजली, बायो-सीएनजी और बायो-इथेनॉल तैयार करने की संभावनाओं पर जोर दिया।
यदि फसल अवशेषों को उपयोगी संसाधन में बदलने के लिए स्थानीय स्तर पर पर्याप्त सुविधाएं विकसित की जाएं, तो किसानों को पराली के प्रबंधन का अतिरिक्त आर्थिक लाभ मिल सकता है। इसके लिए कृषि उत्पादक क्षेत्रों को प्रसंस्करण इकाइयों और संबंधित उद्योगों से जोड़ना भी महत्वपूर्ण होगा।
सरकार और उद्योगों के बीच बेहतर तालमेल से पराली के संग्रह, परिवहन और उपयोग की व्यवस्था को मजबूत किया जा सकता है। इससे किसानों को फसल अवशेषों के निपटान के लिए व्यावहारिक विकल्प मिल सकते हैं।
किसानों को सस्ते विकल्प देना क्यों जरूरी?
पराली प्रबंधन के दौरान किसानों को समय, श्रम और अतिरिक्त खर्च जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। यदि मशीनें समय पर उपलब्ध नहीं हों या उनका किराया अधिक हो, तो किसानों के लिए फसल अवशेषों का उचित प्रबंधन करना मुश्किल हो सकता है।
इसलिए छोटे और सीमांत किसानों तक कृषि मशीनों की पहुंच बढ़ाना, कस्टम हायरिंग सेंटरों को सक्रिय रखना और पराली के वैकल्पिक उपयोग के लिए बाजार तैयार करना जरूरी है।
इसके साथ ही गांव स्तर पर जागरूकता अभियान और समय रहते निगरानी शुरू करने से भी घटनाओं को रोकने में मदद मिल सकती है।
पराली प्रबंधन पर राज्यों की अब होगी असली परीक्षा
केंद्र सरकार के ताजा निर्देशों के बाद अब राज्यों और जिला प्रशासन की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई है। पराली जलाने की घटनाओं पर प्रभावी नियंत्रण के लिए मशीनों की उपलब्धता, जमीनी निगरानी, किसानों को आर्थिक रूप से व्यवहार्य विकल्प और अधिकारियों की जवाबदेही पर एक साथ काम करना होगा।
मध्य प्रदेश और राजस्थान में बढ़ती घटनाओं को देखते हुए स्थानीय स्तर पर समस्याओं की पहचान करना और समय पर सुधारात्मक कदम उठाना जरूरी है। वहीं, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में दर्ज कमी से जुड़े अनुभवों का आकलन भी दूसरे राज्यों के लिए उपयोगी हो सकता है।

