भारत में 30% कपास क्षेत्र में अवैध HTBt खेती का अनुमान। जानें अध्ययन के खुलासे, राज्यवार आंकड़े, ग्लाइफोसेट के बढ़ते इस्तेमाल और किसानों से जुड़े जोखिम।
भारत में अनधिकृत हर्बिसाइड टॉलरेंट बीटी (HTBt) कपास की खेती का दायरा तेजी से बढ़ने का दावा किया गया है। एक नए अध्ययन के मुताबिक, खरीफ सीजन 2025-26 में देश के लगभग 65 से 72 लाख एकड़ क्षेत्र में HTBt कपास उगाए जाने का अनुमान है। यह भारत के कुल कपास उत्पादन क्षेत्र का करीब 24 से 30 प्रतिशत हिस्सा हो सकता है। रिपोर्ट में इस अनौपचारिक बीज बाजार का अनुमानित कारोबार लगभग 1,500 करोड़ रुपये बताया गया है।
दक्षिण एशिया बायोटेक्नोलॉजी सेंटर (SABC) ने फेडरेशन ऑफ सीड इंडस्ट्री ऑफ इंडिया (FSII) और नेशनल सीड एसोसिएशन ऑफ इंडिया (NSAI) के सहयोग से यह अध्ययन तैयार किया है। Unauthorised Cultivation of HTBt Cotton in India: Extent, Drivers & Implications नाम की इस रिपोर्ट में अनधिकृत कपास बीजों के प्रसार, किसानों की पसंद और इससे जुड़े संभावित कृषि एवं जैव सुरक्षा जोखिमों का आकलन किया गया है।
98.2% नमूनों में मिले जेनेटिक गुण
अध्ययन के दौरान प्रयोगशाला में जांचे गए नमूनों में से 98.2 प्रतिशत में कम से कम एक आनुवंशिक रूप से संशोधित गुण पाया गया। वहीं, 41.9 प्रतिशत नमूनों में चार जीनों का संयोजन दर्ज किया गया। रिपोर्ट के अनुसार, इस संयोजन में Vip3A नामक जीन भी शामिल था, जिसे भारत में कपास की खेती के लिए मंजूरी नहीं मिली है।
Vip3A एक कीट-प्रतिरोधी गुण से संबंधित जीन है। अध्ययन में इसके पाए जाने को अनधिकृत बीजों के प्रसार और नियामकीय निगरानी की जरूरत से जोड़कर देखा गया है।
इस शोध में महाराष्ट्र, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और राजस्थान के 16 जिलों को शामिल किया गया। शोधकर्ताओं ने किसानों से बातचीत, बीज वितरण नेटवर्क के आकलन और आनुवंशिक गुणों की पहचान के लिए ELISA आधारित परीक्षणों का उपयोग किया।
मजदूरों की कमी से बढ़ रही HTBt कपास की मांग
रिपोर्ट के मुताबिक, खेतों में मजदूरों की अनुपलब्धता और निराई-गुड़ाई पर बढ़ता खर्च किसानों को अनधिकृत HTBt कपास की ओर आकर्षित करने वाले प्रमुख कारण हैं। कपास की फसल में खरपतवार नियंत्रण की लागत कई किसानों के लिए बड़ी चुनौती बन रही है।
अध्ययन में दिए गए अनुमान के अनुसार, ग्लाइफोसेट के इस्तेमाल से खरपतवार नियंत्रण पर प्रति एकड़ करीब 750 से 850 रुपये खर्च हो सकते हैं। इसके मुकाबले हाथ से निराई-गुड़ाई कराने की लागत लगभग 12,000 से 15,000 रुपये प्रति एकड़ तक पहुंच सकती है।
इन लागतों के अंतर के कारण कुछ किसान ऐसे बीजों को प्राथमिकता दे रहे हैं, जिनके साथ खरपतवार नियंत्रण आसान होने की उम्मीद होती है। हालांकि, अनधिकृत बीजों का इस्तेमाल नियामकीय और कृषि संबंधी जोखिम भी पैदा कर सकता है।
ग्लाइफोसेट की खपत में 26% बढ़ोतरी
अध्ययन में ग्लाइफोसेट की खपत बढ़ने का भी उल्लेख किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, इसका इस्तेमाल 2024-25 में 27,721 किलोलीटर से बढ़कर 2025-26 में 35,642 किलोलीटर हो गया। इस तरह खपत में लगभग 26 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।
रिपोर्ट में दावा किया गया है कि ग्लाइफोसेट की बड़ी मात्रा अनौपचारिक बिक्री नेटवर्क के जरिए किसानों तक पहुंच रही है। इस कारोबार में 20 लीटर के बड़े ड्रमों की बिक्री भी शामिल बताई गई है।
इसी अवधि से जुड़े व्यापक रुझान के तौर पर अध्ययन में यह भी कहा गया है कि 2022 से 2026 के बीच कानूनी रूप से बेचे जाने वाले Bollgard-II कपास बीजों की बिक्री में 22.3 प्रतिशत की गिरावट आई।
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महाराष्ट्र और तेलंगाना में सबसे ज्यादा प्रसार
अध्ययन के मुताबिक, महाराष्ट्र में अनधिकृत HTBt कपास की खेती का अनुमानित प्रसार 58 प्रतिशत रहा। राज्य के यवतमाल जिले में यह आंकड़ा 76 प्रतिशत तक पहुंच गया।
तेलंगाना में इसका अनुमानित प्रसार 66 प्रतिशत दर्ज किया गया। यहां महबूबाबाद जिले में 82 प्रतिशत तक खेती होने की बात रिपोर्ट में कही गई है।
आंध्र प्रदेश में अनधिकृत HTBt कपास का प्रसार 49 प्रतिशत अनुमानित किया गया, जबकि कुर्नूल जिले में यह 75 प्रतिशत रहा।
इसके विपरीत, राजस्थान में HTBt कपास का इस्तेमाल बहुत कम पाया गया। हालांकि, रिपोर्ट में पिंक बॉलवर्म के प्रकोप से निपटने के लिए अनधिकृत BG-III बीजों की मांग बढ़ने का उल्लेख किया गया है।
इन आंकड़ों से संकेत मिलता है कि अलग-अलग कपास उत्पादक क्षेत्रों में मजदूरों की उपलब्धता, खरपतवार नियंत्रण का खर्च और कीटों का दबाव किसानों के बीज चयन को प्रभावित कर सकते हैं।
अनधिकृत बीजों से जैव सुरक्षा संबंधी चिंताएं
अध्ययन में कहा गया है कि गैर-अनुमोदित आनुवंशिक गुणों वाले बीजों का इस्तेमाल केवल नियमों के उल्लंघन का मामला नहीं है। इससे जैव सुरक्षा, फसल प्रबंधन और पर्यावरण पर संभावित प्रभावों को लेकर भी सवाल उठते हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, ग्लाइफोसेट का जरूरत से ज्यादा या बिना उचित निगरानी इस्तेमाल करने से कुछ खरपतवारों में शाकनाशी प्रतिरोध विकसित होने का खतरा बढ़ सकता है। ऐसी स्थिति में भविष्य में खरपतवार नियंत्रण अधिक कठिन और महंगा हो सकता है।
अनौपचारिक बाजार से खरीदे गए बीजों की गुणवत्ता भी एक अहम चिंता है। नियामकीय व्यवस्था से बाहर बेचे जाने वाले बीजों के अपेक्षित परिणाम नहीं देने पर किसानों को शिकायत दर्ज कराने, मुआवजा पाने या समाधान हासिल करने में मुश्किल हो सकती है।
विशेषज्ञों ने नियामकीय निगरानी मजबूत करने पर दिया जोर
इंडियन सोसाइटी फॉर कॉटन इम्प्रूवमेंट के अध्यक्ष और दक्षिण एशिया बायोटेक्नोलॉजी सेंटर के अध्यक्ष डॉ. सी.डी. मये ने अनधिकृत जीनों के इस्तेमाल और ग्लाइफोसेट के अनियंत्रित प्रयोग को लेकर चिंता जताई। उनके मुताबिक, इससे प्रतिरोधी कीटों और खरपतवारों के उभरने का खतरा बढ़ सकता है, जिसका असर कपास की उत्पादकता पर पड़ सकता है।
उन्होंने कहा कि कृषि तकनीक का प्रभावी प्रबंधन और निगरानी सुनिश्चित करने के लिए नियामकीय मंजूरी तथा जिम्मेदार इस्तेमाल महत्वपूर्ण हैं।
FSII के अध्यक्ष अजय राणा ने भी अनधिकृत HTBt खेती के बढ़ते प्रसार को किसानों की जरूरतों और औपचारिक बाजार में उपलब्ध तकनीकों के बीच अंतर से जोड़ा। उन्होंने कहा कि किसानों को उनकी व्यावहारिक समस्याओं के अनुरूप तकनीक उपलब्ध कराने के लिए नीतिगत व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता है।
राणा ने कपास की उत्पादकता बढ़ाने और घरेलू उत्पादन को मजबूत करने के लिए नियामकीय प्रक्रियाओं पर पुनर्विचार करने की मांग की। उन्होंने हर्बिसाइड टॉलरेंट कपास और पिंक बॉलवर्म प्रतिरोधी गुणों को मंजूरी देने के मुद्दे पर भी जोर दिया। हालांकि, किसी भी नई तकनीक की मंजूरी संबंधित नियामकीय आकलन और जैव सुरक्षा मानकों के अनुरूप ही होनी चाहिए।
कपास क्षेत्र के लिए समय पर नीतिगत कदम जरूरी
अध्ययन के निष्कर्षों के मुताबिक, अनधिकृत HTBt कपास की खेती का प्रसार कई परस्पर जुड़ी समस्याओं की ओर इशारा करता है। इनमें खेती की बढ़ती लागत, कृषि मजदूरों की कमी, खरपतवार प्रबंधन की चुनौती और अनौपचारिक बीज बाजारों का विस्तार शामिल हैं।
रिपोर्ट में बीजों की बिक्री पर निगरानी मजबूत करने, किसानों को गुणवत्तापूर्ण बीज उपलब्ध कराने, शिकायत निवारण व्यवस्था बेहतर बनाने और खरपतवार प्रबंधन के प्रभावी विकल्प विकसित करने की जरूरत बताई गई है।
विशेषज्ञों के अनुसार, किसानों की वास्तविक समस्याओं को समझते हुए कृषि तकनीकों के नियमन, बीज गुणवत्ता और जैव सुरक्षा के बीच संतुलन बनाना जरूरी है। समयबद्ध नीतिगत कदम भारत के कपास क्षेत्र की उत्पादकता, किसानों की आर्थिक स्थिति और दीर्घकालिक स्थिरता को बेहतर बनाने में मदद कर सकते हैं।

