बालाघाट के किरनापुर में युवा किसान युवराज पारधी 50 डिसमिल खेत में सिंघाड़े की खेती कर जलभराव वाली जमीन का बेहतर उपयोग कर रहे हैं।
जिले के किरनापुर विकासखंड के ग्राम कांद्रिकला (गन्नाटोला) के युवा किसान युवराज पारधी ने खेती में नवाचार की मिसाल पेश की है। जिन खेतों में अधिक पानी जमा होने के कारण पारंपरिक फसलों की खेती करना मुश्किल होता है, उन्हीं परिस्थितियों को उन्होंने कमाई के नए अवसर में बदलने की पहल की है। युवराज ने अपने खेत के लगभग 50 डिसमिल क्षेत्र में सिंघाड़े की खेती शुरू की है।
जलभराव वाले खेत को बनाया खेती का नया अवसर
कई किसानों के लिए खेतों में लंबे समय तक पानी भरा रहना खेती की बड़ी चुनौती बन जाता है। ऐसी स्थिति में फसल का चयन करना आसान नहीं होता। लेकिन सही फसल और उपलब्ध संसाधनों का बेहतर उपयोग करके खेती को लाभकारी बनाया जा सकता है।
इसी सोच के साथ युवराज पारधी ने अपने खेत की प्राकृतिक परिस्थितियों को समझते हुए सिंघाड़े की खेती का विकल्प चुना। पानी से भरपूर खेतों के लिए उपयुक्त इस फसल के जरिए वे कृषि में विविधता लाने का प्रयास कर रहे हैं। उनकी यह पहल बताती है कि स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप खेती करने से किसानों के सामने नए विकल्प खुल सकते हैं।
50 डिसमिल में सिंघाड़े की फसल, अतिरिक्त आय की उम्मीद
युवा किसान युवराज पारधी ने करीब 50 डिसमिल जमीन पर सिंघाड़े की फसल लगाई है। इस पहल का उद्देश्य खेत में उपलब्ध जल संसाधन का उपयोग करते हुए पारंपरिक खेती के अलावा एक वैकल्पिक फसल को बढ़ावा देना है।
सिंघाड़े की खेती जलयुक्त क्षेत्रों में की जा सकती है। ऐसे में जिन किसानों के खेतों में पर्याप्त पानी उपलब्ध रहता है, वे अपनी जमीन की प्रकृति, खेती की लागत और स्थानीय बाजार की मांग का आकलन करके इस फसल पर विचार कर सकते हैं।
हालांकि, किसी भी वैकल्पिक फसल को अपनाने से पहले उसके उत्पादन खर्च, बाजार में बिक्री की संभावनाओं और स्थानीय कृषि परिस्थितियों की जानकारी लेना जरूरी है।
also read: गेंदा फूल की खेती पर बिहार सरकार दे रही ₹40,000 तक सब्सिडी, जानें…
कृषि अधिकारियों ने खेत पहुंचकर किया निरीक्षण
युवराज पारधी के सिंघाड़ा उत्पादन क्षेत्र का कृषि विकास अधिकारी विजय सिंह अहाके और कृषि विस्तार अधिकारी गांधी घोरमारे सेवती ने निरीक्षण किया। इस दौरान अधिकारियों ने खेत में लगी फसल की स्थिति, पानी की उपलब्धता और उत्पादन की प्रगति का जायजा लिया।
निरीक्षण के दौरान फसल की परिस्थितियों और जल संसाधनों के उपयोग से जुड़े पहलुओं को देखा गया। यह पहल स्थानीय स्तर पर खेती के नए तरीकों को समझने और किसानों को फसल विविधीकरण के प्रति जागरूक करने के लिहाज से महत्वपूर्ण है।
किसानों के लिए क्या है इस पहल का संदेश?
कृषि विस्तार अधिकारी गांधी घोरमारे ने किसानों को सलाह दी कि वे फसल का चयन करते समय अपने खेत की प्रकृति, उपलब्ध संसाधनों और बाजार की मांग को प्राथमिकता दें। उनके अनुसार, जलयुक्त क्षेत्रों में सिंघाड़े जैसी उपयुक्त फसलों को अपनाकर प्राकृतिक संसाधनों का बेहतर उपयोग किया जा सकता है और अतिरिक्त आय की संभावनाएं तलाशी जा सकती हैं।
बालाघाट जिले के किरनापुर क्षेत्र में युवराज पारधी का यह प्रयास उन किसानों के लिए प्रेरणादायक उदाहरण है, जो जलभराव की समस्या के कारण खेती के विकल्प तलाश रहे हैं। खेत की परिस्थितियों को ध्यान में रखकर फसल चुनना कृषि में विविधता लाने का प्रभावी तरीका हो सकता है।
युवराज पारधी की पहल से यह संदेश मिलता है कि खेती में सफलता के लिए केवल पारंपरिक तरीकों पर निर्भर रहना जरूरी नहीं है। स्थानीय संसाधनों, उपयुक्त फसलों और बाजार की संभावनाओं को समझकर किसान खेती के नए रास्ते तलाश सकते हैं।

