छिंदवाड़ा में कामधेनु योजना से भगवानदास ने डेयरी व्यवसाय बढ़ाया। दूध उत्पादन 25 से बढ़कर 280 लीटर प्रतिदिन हुआ, आय और रोजगार के अवसर भी बढ़े।
मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले में सरकारी योजना की मदद से पशुपालन को व्यवसाय के रूप में अपनाने की एक प्रेरणादायक तस्वीर सामने आई है। अमरवाड़ा विकासखंड के जमुनिया भूरा गांव निवासी भगवानदास सूर्यवंशी ने डॉ. भीमराव अंबेडकर कामधेनु योजना का लाभ लेकर अपने पारंपरिक पशुपालन को व्यवस्थित डेयरी व्यवसाय में बदल दिया है।
सीमित संसाधनों और कम उत्पादकता वाले पशुओं के कारण पहले भगवानदास को रोजाना करीब 20 से 25 लीटर दूध ही प्राप्त होता था। बड़े स्तर पर डेयरी शुरू करने की इच्छा होने के बावजूद पूंजी की कमी उनके सामने बड़ी चुनौती थी। सरकारी योजना से वित्तीय सहायता मिलने के बाद उन्होंने आधुनिक तरीके से पशुपालन शुरू किया, जिसका असर दूध उत्पादन और आय दोनों पर दिखाई दे रहा है।
योजना से मिला डेयरी व्यवसाय को विस्तार
34 वर्षीय भगवानदास सूर्यवंशी ने माध्यमिक स्तर तक शिक्षा प्राप्त की है। योजना का लाभ लेने से पहले वे सामान्य तरीके से अवर्णित नस्ल के पशुओं का पालन करते थे। पशुओं की कम उत्पादकता के कारण उनकी आमदनी भी सीमित थी।
पशुपालन को बड़े व्यवसाय में बदलने की उनकी इच्छा थी, लेकिन पर्याप्त पूंजी नहीं होने के कारण वह इसे विस्तार नहीं दे पा रहे थे। इसी दौरान पशुपालन विभाग के माध्यम से उन्हें डॉ. भीमराव अंबेडकर कामधेनु योजना की जानकारी मिली।
पशु चिकित्सालय अमरवाड़ा के विकासखंड अधिकारी डॉ. मयंक परवारी के मार्गदर्शन में उन्होंने योजना के लिए आवेदन किया। इसके बाद उप संचालक पशुपालन एवं डेयरी विभाग छिंदवाड़ा के मार्गदर्शन में उनका प्रकरण तैयार किया गया।
42 लाख रुपये की परियोजना से शुरू हुआ काम
योजना के तहत भगवानदास की कुल परियोजना लागत 42 लाख रुपये निर्धारित की गई। मध्यप्रदेश ग्रामीण बैंक, अमरवाड़ा से उन्हें वित्तीय सहायता मिली। 24 मार्च 2026 को बैंक की ओर से 33.60 लाख रुपये का ऋण स्वीकृति पत्र जारी किया गया।
इसके बाद पहले चरण में 8.80 लाख रुपये और आगे 9 लाख रुपये की ऋण राशि जारी की गई। इस आर्थिक सहयोग का इस्तेमाल उन्होंने डेयरी कारोबार को विकसित करने में किया।
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2500 वर्गफुट में तैयार किया पशु शेड
वित्तीय सहायता मिलने के बाद भगवानदास ने करीब 2500 वर्गफुट क्षेत्र में पशु शेड तैयार कराया। इसके साथ ही उन्होंने 17 दुधारू भैंस वंशीय पशु खरीदे।
पारंपरिक पशुपालन के बजाय उन्होंने वैज्ञानिक तरीके अपनाने पर जोर दिया। पशुपालन विभाग की सहायता से उन्हें पशु चिकित्सा महाविद्यालय जबलपुर में प्रशिक्षण भी मिला। प्रशिक्षण के दौरान पशुओं के पोषण, स्वास्थ्य, देखभाल और बेहतर दुग्ध उत्पादन से संबंधित वैज्ञानिक तकनीकों की जानकारी दी गई।
20-25 लीटर से बढ़कर 250-280 लीटर हुआ दूध
कामधेनु योजना और वैज्ञानिक पशुपालन का सबसे बड़ा प्रभाव दूध उत्पादन पर पड़ा। पहले जहां भगवानदास के पशुओं से रोजाना करीब 20 से 25 लीटर दूध मिलता था, वहीं अब यह उत्पादन बढ़कर लगभग 250 से 280 लीटर प्रतिदिन हो गया है।
दूध उत्पादन में इस वृद्धि से डेयरी की आय में भी उल्लेखनीय सुधार हुआ। वर्तमान में उन्हें दूध बेचकर लगभग 18 से 20 हजार रुपये प्रतिदिन की आमदनी होने की जानकारी दी गई है।
डेयरी से परिवार के साथ दूसरे लोगों को भी रोजगार
डेयरी कारोबार बढ़ने से भगवानदास के परिवार की आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ है। पशुपालन से परिवार के सदस्यों को रोजगार मिला है। इसके अलावा वे दो अन्य लोगों को भी काम उपलब्ध करा रहे हैं।
अब पशुपालन उनके लिए केवल परिवार के भरण-पोषण का माध्यम नहीं रहा, बल्कि एक व्यवस्थित और लाभकारी व्यवसाय का रूप ले चुका है।
दूध प्रसंस्करण इकाई लगाने की तैयारी
डेयरी व्यवसाय में मिली सफलता के बाद भगवानदास अब कारोबार को अगले स्तर तक ले जाने की योजना बना रहे हैं। भविष्य में वे दूध प्रसंस्करण इकाई स्थापित करना चाहते हैं।
इससे दूध से मूल्यवर्धित उत्पाद तैयार करने और कारोबार से अतिरिक्त आय अर्जित करने के नए अवसर पैदा होने की उम्मीद है।
अन्य पशुपालकों को भी योजना का लाभ लेने की सलाह
भगवानदास का कहना है कि सरकारी योजना की मदद से उन्हें अपने पशुपालन व्यवसाय का विस्तार करने का अवसर मिला। वे योजना से संतुष्ट हैं और दूसरे पशुपालकों को भी सरकारी योजनाओं की जानकारी लेकर पशुपालन को व्यवस्थित व्यवसाय के रूप में अपनाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं।
भगवानदास की सफलता यह बताती है कि उचित वित्तीय सहायता, प्रशिक्षण और वैज्ञानिक पशुपालन तकनीकों को अपनाकर डेयरी व्यवसाय को अधिक लाभकारी बनाया जा सकता है। कामधेनु योजना से जुड़ी यह पहल आत्मनिर्भरता, रोजगार और ग्रामीण आय बढ़ाने की दिशा में एक उदाहरण के रूप में सामने आई है।

