उत्तराखंड सरकार ने जंगलों की आग बुझाने और रोकने वालों के लिए 1 लाख रुपये तक के नकद इनाम की घोषणा की है। जानिए Forest Fire Control 2026 योजना, फायर वॉचर्स, पिरूल स्कीम और वनाग्नि रोकने की पूरी तैयारी।
उत्तराखंड में लगातार बढ़ रही जंगलों की आग की घटनाओं को देखते हुए राज्य सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। अब जंगलों की आग रोकने और बुझाने में अहम भूमिका निभाने वाले लोगों और टीमों को नकद पुरस्कार दिया जाएगा। नई योजना के तहत अधिकतम 1 लाख रुपये तक का इनाम देने का प्रावधान किया गया है।
वन विभाग द्वारा आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में मुख्य वन संरक्षक (वनाग्नि) सुशांत पटनायक ने “फॉरेस्ट फायर कंट्रोल एंड मैनेजमेंट 2026” रणनीति की जानकारी दी। इस दौरान वन मंत्री सुबोध उनियाल और वन विभाग प्रमुख रंजन मिश्रा भी मौजूद रहे।
हर जिले में दिए जाएंगे तीन बड़े पुरस्कार
सरकार की नई नीति के अनुसार फायर सीजन समाप्त होने के बाद प्रत्येक जिले में वनाग्नि नियंत्रण में उत्कृष्ट कार्य करने वालों को सम्मानित किया जाएगा। पुरस्कार राशि इस प्रकार होगी:
- पहला पुरस्कार – 1 लाख रुपये
- दूसरा पुरस्कार – 75 हजार रुपये
- तीसरा पुरस्कार – 51 हजार रुपये
सरकार का उद्देश्य आम नागरिकों, वनकर्मियों, स्वयं सहायता समूहों और स्थानीय समितियों को जंगल बचाने के अभियान में सक्रिय रूप से जोड़ना है।
पिछले 10 वर्षों में 14 हजार से ज्यादा वनाग्नि की घटनाएं
वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार पिछले 10 सालों में उत्तराखंड में 14,638 जंगलों में आग लगने की घटनाएं दर्ज की गईं। इन हादसों में लगभग 23,682 हेक्टेयर वन क्षेत्र प्रभावित हुआ।
इन घटनाओं में:
- 35 लोगों की मौत हुई
- 76 लोग घायल हुए
साल 2026 में भी हालात चिंताजनक बने हुए हैं। अब तक 394 वनाग्नि की घटनाएं सामने आ चुकी हैं, जिनमें 331 हेक्टेयर से अधिक जंगल प्रभावित हुए हैं।
बढ़ता तापमान और सूखा बना बड़ी वजह
वन विभाग के अनुसार जलवायु परिवर्तन जंगलों की आग का प्रमुख कारण बनता जा रहा है। बढ़ता तापमान, लंबे समय तक सूखा, अनियमित मानसून और एल नीनो जैसी जलवायु परिस्थितियों के चलते वनाग्नि की घटनाओं में तेजी आई है। IMD देहरादून केंद्र ने भी आने वाले दिनों में तापमान बढ़ने की चेतावनी दी है, जिससे आग का खतरा और बढ़ सकता है।
चमोली में महिला की दर्दनाक मौत
चमोली जिले के बूंगा गांव में जंगल की आग ने एक महिला की जान ले ली। 50 वर्षीय सुरेशी देवी अपनी गौशाला की ओर जा रही थीं, तभी तेज हवाओं के कारण आग तेजी से फैल गई और वह उसकी चपेट में आ गईं। ग्रामीणों ने उन्हें बचाने की कोशिश की, लेकिन अस्पताल पहुंचने से पहले ही उनकी मौत हो गई।
इसके अलावा पालछूनी और रेस चोपता गांवों में भी आग की घटनाएं सामने आईं। एक अन्य महिला कश्मीरा देवी गंभीर रूप से झुलस गईं और उनका इलाज अस्पताल में चल रहा है।
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कई जिलों में जंगलों की आग से दहशत
देहरादून के त्यूणी क्षेत्र में आग से जंगलों के साथ-साथ सेब के बाग और ग्रामीणों की संपत्ति भी प्रभावित हुई है। वहीं नई टिहरी, गढ़वाल और कुमाऊं के कई इलाकों में आग लगातार फैल रही है। आग अब 6 हजार फीट की ऊंचाई तक पहुंच चुकी है।
सरकार की हाईटेक तैयारी
उत्तराखंड सरकार ने इस बार जंगलों की आग रोकने के लिए तकनीक और संसाधनों पर विशेष जोर दिया है।
प्रमुख तैयारियां:
- 5,625 फायर वॉचर्स की तैनाती
- सभी कर्मियों का 10 लाख रुपये तक का दुर्घटना बीमा
- फायर रेक, सुरक्षा सूट, हेलमेट और हेडलैंप उपलब्ध कराए गए
- इंटीग्रेटेड कमांड एंड कंट्रोल सेंटर की स्थापना
- 1,438 क्रू स्टेशन और 174 फायर वॉचर टावर सक्रिय
इसके अलावा राज्यभर में 3,235 जनजागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए गए, जिनमें 81 हजार से अधिक लोगों ने भाग लिया।
हेल्पलाइन और मोबाइल ऐप लॉन्च
वन विभाग ने जंगलों में आग की सूचना तुरंत देने के लिए IVRS हेल्पलाइन नंबर 1926 शुरू किया है। साथ ही “उत्तराखंड फॉरेस्ट फायर” मोबाइल ऐप भी लॉन्च किया गया है।
ग्राम पंचायत स्तर पर 496 फॉरेस्ट फायर प्रोटेक्शन एंड मैनेजमेंट कमेटियां बनाई गई हैं। आग रोकने में मदद करने वाली समितियों को 30 हजार रुपये तक का प्रोत्साहन दिया जा रहा है।
पिरूल से अब होगी कमाई
चीड़ के पेड़ों से गिरने वाली सूखी पत्तियां यानी पिरूल जंगल की आग का बड़ा कारण मानी जाती हैं। अब सरकार इसे रोजगार का साधन बनाने पर काम कर रही है।
“पाइन पिरूल कलेक्शन स्कीम” के तहत स्थानीय लोगों को पिरूल इकट्ठा करने पर 10 रुपये प्रति किलो का भुगतान किया जा रहा है।
राज्य में पिरूल से पेलेट और ब्रिकेट बनाने की 9 इकाइयां संचालित हैं। पिछले चार वर्षों में 13 हजार टन से ज्यादा पिरूल संग्रह किया गया है, जबकि 2026 के लिए 8,555 टन का लक्ष्य तय किया गया है।

