कुफरी जामुनिया आलू की खास किस्म है, जो 90 दिन में तैयार हो सकती है। जानें इसकी खेती, 35 टन तक पैदावार और पोषण संबंधी खूबियां।
आलू की खेती करने वाले किसानों के लिए कुफरी जामुनिया एक उपयोगी विकल्प बन सकती है। अपने आकर्षक बैंगनी रंग, पोषण संबंधी खूबियों और अच्छी उत्पादन क्षमता के कारण यह किस्म खास पहचान रखती है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान (CPRI) ने इसे विकसित किया है। अनुकूल परिस्थितियों और अनुशंसित कृषि तकनीकों के साथ इसकी औसत पैदावार 32 से 35 टन प्रति हेक्टेयर तक हो सकती है। इसकी फसल लगभग 90 दिनों में तैयार हो सकती है, जिससे किसानों को कम अवधि में उपज प्राप्त करने का अवसर मिलता है।
90 दिन में तैयार हो सकती है कुफरी जामुनिया की फसल
कुफरी जामुनिया मध्यम अवधि में तैयार होने वाली आलू की किस्म है। इसके पौधों की ऊंचाई मध्यम रहती है और पत्तियां घनी होती हैं। इस किस्म के आलू लंबे और अंडाकार आकार के होते हैं। इनकी सबसे बड़ी पहचान इनकी गहरी बैंगनी त्वचा और बैंगनी गूदा है।
एक पौधे में सामान्यतः 10 से 12 मध्यम या बड़े आकार के कंद विकसित हो सकते हैं। हालांकि, वास्तविक उत्पादन मिट्टी की गुणवत्ता, मौसम, सिंचाई, बीज की गुणवत्ता और खेती के तरीके पर निर्भर करता है।
कृषि अनुसंधान संस्थान में किए गए परीक्षणों के दौरान 90 दिनों में इसकी उपज लगभग 49 टन प्रति हेक्टेयर तक दर्ज की गई। वहीं, अनुशंसित खेती पद्धतियों के अंतर्गत सामान्य उत्पादन क्षमता 32 से 35 टन प्रति हेक्टेयर बताई गई है। इसलिए किसानों को परीक्षणों में मिली अधिकतम उपज को सामान्य खेतों में मिलने वाली पैदावार से अलग समझना चाहिए।
सामान्य आलू से ज्यादा पोषक तत्वों वाली किस्म
कुफरी जामुनिया केवल रंग के कारण ही खास नहीं है, बल्कि इसके पोषण संबंधी गुण भी इसे दूसरी किस्मों से अलग बनाते हैं। इसमें एंथोसायनिन, कैरोटीनॉयड, विटामिन C, आयरन और जिंक जैसे पोषक तत्व पाए जाते हैं।
एंथोसायनिन प्राकृतिक रंगद्रव्य हैं, जिनकी वजह से आलू का गूदा और छिलका बैंगनी दिखाई देता है। ये अपने एंटीऑक्सीडेंट गुणों के लिए भी जाने जाते हैं।
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, कुफरी जामुनिया के गूदे में प्रति 100 ग्राम लगभग 42.75 मिलीग्राम विटामिन C पाया जाता है। तुलना के लिए सामान्य आलू में यह मात्रा करीब 23.15 मिलीग्राम बताई गई है।
इसी तरह, इस किस्म में प्रति 100 ग्राम लगभग 2.28 मिलीग्राम जिंक और 3.22 मिलीग्राम आयरन होने की जानकारी दी गई है। सामान्य आलू के लिए क्रमशः लगभग 0.28 मिलीग्राम जिंक और 0.57 मिलीग्राम आयरन के आंकड़े बताए गए हैं।
इसके अलावा, इसके गूदे में एंथोसायनिन की मात्रा करीब 42.05 मिलीग्राम प्रति 100 ग्राम और छिलके में लगभग 80.66 मिलीग्राम प्रति 100 ग्राम बताई गई है। इन पोषक तत्वों के कारण यह किस्म संतुलित और विविधतापूर्ण आहार के लिहाज से उपयोगी हो सकती है।
उत्तर भारत के मैदानी इलाकों में खेती के लिए उपयुक्त
कुफरी जामुनिया को उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्रों के लिए उपयुक्त किस्म बताया गया है। अलग-अलग स्थानों पर किए गए परीक्षणों में इसके प्रदर्शन का आकलन किया गया है।
इस किस्म के कंदों में लगभग 6 से 8 सप्ताह की मध्यम सुप्तावस्था होती है। सुप्तावस्था का अर्थ है कि कटाई के बाद कुछ समय तक आलू में अंकुरण शुरू नहीं होता। इससे उचित परिस्थितियों में भंडारण और बिक्री की योजना बनाने में सहायता मिल सकती है।
इसकी भंडारण क्षमता भी एक महत्वपूर्ण विशेषता मानी जाती है। सही तापमान, नमी और वेंटिलेशन वाले भंडार में आलू की गुणवत्ता बनाए रखने तथा वजन में होने वाली कमी को सीमित करने में मदद मिल सकती है। किसानों को बेहतर परिणामों के लिए स्थानीय कृषि विशेषज्ञों की भंडारण संबंधी सलाह अपनानी चाहिए।
also read: चीनी बिक्री कोटा 2026: चीनी मिलों को केंद्र सरकार की बड़ी राहत, अक्टूबर…
सब्जी से लेकर पराठे तक, कई व्यंजनों में इस्तेमाल
बैंगनी रंग वाली कुफरी जामुनिया का उपयोग सामान्य आलू की तरह कई तरह के खाद्य पदार्थ बनाने में किया जा सकता है। इससे आलू की सब्जी, पराठा, पूरी, रायता, सूप और हलवा तैयार किए जा सकते हैं।
इसके अलावा, इसे उपमा, डोसा और इडली जैसे व्यंजनों में भी इस्तेमाल किया जा सकता है। आलू के आटे तथा कुछ बेकरी उत्पादों में इसके उपयोग की संभावनाएं भी हैं।
इसके विशिष्ट रंग और पोषण संबंधी विशेषताओं के कारण खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र में भी इस किस्म को उपयोगी विकल्प के रूप में देखा जा सकता है।
ICAR-CPRI ने विकसित की हैं कई रंगीन आलू किस्में
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान ने आलू की अलग-अलग रंगों वाली किस्में विकसित की हैं। इनमें कुफरी जामुनिया के साथ कुफरी नीलकंठ और कुफरी माणिक भी शामिल हैं।
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, कुफरी नीलकंठ को 2018 में, कुफरी माणिक को 2021 में और कुफरी जामुनिया को 2024 में जारी किया गया था।
कुफरी नीलकंठ अपने बैंगनी रंग के लिए जानी जाती है, जबकि कुफरी माणिक के कंदों की बाहरी त्वचा गहरी लाल और अंदर का हिस्सा पीला होता है। दूसरी ओर, कुफरी जामुनिया के गहरे बैंगनी गूदे और पोषण संबंधी खूबियों ने इसे खास बनाया है।
किसानों को कुफरी जामुनिया की खेती से क्या फायदा हो सकता है?
कम अवधि में फसल तैयार होने की संभावना, अच्छी उपज क्षमता और कंदों की विशिष्ट विशेषताएं इस किस्म को किसानों के लिए आकर्षक बना सकती हैं। यदि स्थानीय जलवायु इसके अनुकूल हो और बाजार में रंगीन आलू की मांग उपलब्ध हो, तो किसानों को इससे अतिरिक्त व्यावसायिक अवसर मिल सकते हैं।
हालांकि, खेती शुरू करने से पहले किसानों को अपने क्षेत्र के कृषि विज्ञान केंद्र या स्थानीय कृषि विशेषज्ञ से इसकी उपयुक्तता, प्रमाणित बीज की उपलब्धता और अनुशंसित खेती पद्धति की जानकारी लेनी चाहिए। केवल अधिकतम परीक्षण उपज के आधार पर लाभ का अनुमान लगाना उचित नहीं होगा।

