भारत में ट्राउट मछली का उत्पादन छह गुना बढ़कर 5,000 टन सालाना पहुंचा। जानें उत्तराखंड में ट्राउट पालन, सरकारी निवेश और किसानों की आय के अवसर।
भारत में शीतजल मत्स्यपालन तेजी से ग्रामीण अर्थव्यवस्था और पहाड़ी क्षेत्रों में रोजगार का महत्वपूर्ण माध्यम बन रहा है। पिछले 10 वर्षों में देश में ट्राउट मछली का उत्पादन करीब छह गुना बढ़कर लगभग 5,000 मीट्रिक टन प्रतिवर्ष हो गया है। इस बढ़ोतरी से पर्वतीय क्षेत्रों के किसानों को आय के नए स्रोत मिल रहे हैं और मत्स्यपालन को व्यावसायिक गतिविधि के रूप में अपनाने का अवसर मिल रहा है।
इस क्षेत्र के विकास के लिए केंद्र सरकार प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY) के अंतर्गत 2,299 करोड़ रुपये से अधिक का निवेश कर चुकी है। इसी क्रम में मत्स्यपालन विभाग के सचिव डॉ. अभिलक्ष लिखी ने 18 अक्टूबर 2026 को उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले के मुनस्यारी क्षेत्र का दौरा किया। उन्होंने यहां चल रही शीतजल मत्स्यपालन गतिविधियों का जायजा लिया और ट्राउट उत्पादकों से बातचीत कर उनकी जरूरतों तथा चुनौतियों की जानकारी प्राप्त की।
मुनस्यारी में रेनबो ट्राउट पालन से किसानों को मिल रहे नए अवसर
डॉ. अभिलक्ष लिखी ने अपने दौरे के दौरान जौहर मत्स्य स्वायत्त सहकारिता और नमजाला ट्राउट फार्म का निरीक्षण किया। इस दौरान उन्होंने स्थानीय मत्स्यपालकों से ट्राउट उत्पादन, बाजार की संभावनाओं और इस व्यवसाय से होने वाले आर्थिक लाभों पर चर्चा की।
उन्होंने रेनबो ट्राउट पालन को ग्रामीण परिवारों के लिए स्थायी आजीविका का विकल्प बनाने में सहकारी समितियों के योगदान की सराहना की। मुनस्यारी में बहने वाली गोरी गंगा नदी की ठंडी जलधाराएं और यहां का अनुकूल तापमान ट्राउट पालन के लिए उपयुक्त परिस्थितियां उपलब्ध कराते हैं।
इन प्राकृतिक संसाधनों की मदद से क्षेत्र में मछली पालन की संभावनाएं बढ़ी हैं। इससे स्थानीय लोगों को पारंपरिक कृषि के साथ आय अर्जित करने के लिए एक अतिरिक्त व्यवसाय अपनाने का अवसर मिल रहा है।
प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना से मजबूत हो रहा शीतजल मत्स्यपालन
केंद्र सरकार शीतजल मत्स्यपालन के विकास के लिए बुनियादी सुविधाओं के विस्तार पर जोर दे रही है। प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के तहत 2,299 करोड़ रुपये से अधिक के निवेश का उद्देश्य मछली उत्पादन बढ़ाना, आधुनिक सुविधाएं विकसित करना और मत्स्यपालकों को बेहतर बाजार उपलब्ध कराना है।
उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश देश के प्रमुख शीतजल मत्स्यपालन क्षेत्र हैं। यहां की पहाड़ी नदियां, ऊंचाई पर स्थित झीलें और ठंडे पानी के स्रोत रेनबो ट्राउट जैसी मछलियों के पालन के लिए अनुकूल माने जाते हैं।
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इन छह राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में योजना के तहत 5,600 से अधिक रेसवे, 54 हैचरी, 293 कोल्ड स्टोरेज और 260 फीड मिल स्थापित करने की मंजूरी दी गई है।
इन सुविधाओं से मछलियों के बीज उत्पादन, पालन के लिए चारे की उपलब्धता, उत्पादों के सुरक्षित भंडारण और बाजार तक उनकी आपूर्ति को बेहतर बनाने में मदद मिल सकती है।
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उत्तराखंड में 317 करोड़ रुपये की मत्स्य परियोजनाओं को मंजूरी
उत्तराखंड में मत्स्यपालन क्षेत्र के विस्तार के लिए 317 करोड़ रुपये की विभिन्न परियोजनाओं को स्वीकृति दी गई है। इन परियोजनाओं में आधुनिक मछली बाजार, लैंडिंग सेंटर और सितारगंज में एकीकृत एक्वापार्क का विकास शामिल है।
इसके अतिरिक्त, राज्य सरकार ने 170 करोड़ रुपये के बजट वाली ट्राउट प्रोत्साहन योजना शुरू की है। इसके अंतर्गत वर्ष 2028-29 तक 1,500 रेसवे, 100 मिनी हैचरी और 600 कोल्ड स्टोरेज सुविधाएं विकसित करने का लक्ष्य रखा गया है।
इन योजनाओं का उद्देश्य ट्राउट पालन की क्षमता बढ़ाने के साथ-साथ मछलियों के भंडारण, परिवहन और विपणन से जुड़ी समस्याओं को कम करना है। बेहतर बुनियादी ढांचा तैयार होने से उत्पादकों को अपने उत्पाद अधिक प्रभावी तरीके से बाजार तक पहुंचाने में मदद मिल सकती है।
उत्तराखंड से नेपाल को ट्राउट निर्यात, ITBP भी खरीद रहा मछली
उत्तराखंड के मत्स्यपालन क्षेत्र के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में पहुंच बढ़ाने की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, राज्य ने जून 2026 में पहली बार नेपाल को ट्राउट मछली का निर्यात किया। इससे स्थानीय उत्पादकों के लिए सीमा पार व्यापार की नई संभावनाएं खुली हैं।
इसके अलावा, उत्तराखंड सरकार और भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP) के बीच हुए समझौता ज्ञापन के तहत राज्य का मत्स्यपालन विभाग आईटीबीपी को ट्राउट मछली उपलब्ध करा रहा है।
संस्थागत खरीद की यह व्यवस्था मत्स्यपालकों को बाजार से जोड़ने में उपयोगी हो सकती है। इससे उत्पादकों को संभावित खरीदारों तक पहुंच बनाने और अपनी उपज के लिए नियमित मांग विकसित करने में सहायता मिल सकती है।
ICAR संस्थान किसानों को दे रहा वैज्ञानिक प्रशिक्षण
उत्तराखंड में ट्राउट पालन को आगे बढ़ाने में भीमताल स्थित आईसीएआर-सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ कोल्डवाटर फिशरीज रिसर्च (ICAR-CICFR) की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। संस्थान मत्स्यपालकों को मछली के बीज उत्पादन, रोग प्रबंधन और पालन की आधुनिक तकनीकों से संबंधित वैज्ञानिक सहायता प्रदान करता है।
मुनस्यारी दौरे के दौरान सचिव ने संस्थान के योगदान की सराहना की। वैज्ञानिक प्रशिक्षण और तकनीकी मार्गदर्शन के माध्यम से किसानों को मछलियों के स्वास्थ्य की देखभाल, उत्पादन में सुधार और पालन के दौरान आने वाली समस्याओं से निपटने में मदद मिलती है।
इस तरह अनुसंधान संस्थानों की विशेषज्ञता और सरकारी योजनाओं का समन्वय शीतजल मत्स्यपालन को अधिक व्यवस्थित तथा व्यावसायिक बनाने में सहायक हो सकता है।
पहाड़ी क्षेत्रों में रोजगार और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मिलेगा सहारा
ट्राउट मछली पालन का लाभ केवल उत्पादन बढ़ने तक सीमित नहीं है। यह पहाड़ी गांवों में रोजगार सृजन, किसानों की आय के स्रोतों में विविधता और स्थानीय स्तर पर आर्थिक गतिविधियां बढ़ाने का माध्यम बन सकता है।
इस क्षेत्र के विस्तार से पोषण सुरक्षा को मजबूत करने और मछली उत्पादों के निर्यात की संभावनाओं को बढ़ाने में भी मदद मिल सकती है। इसके साथ ही, ट्राउट फार्मिंग को पर्यटन गतिविधियों से जोड़कर इको-टूरिज्म को प्रोत्साहित किया जा सकता है।
शीतजल मत्स्यपालन के साथ जल संसाधनों के संरक्षण और महासीर जैसी संकटग्रस्त मछली प्रजातियों के संरक्षण पर भी ध्यान देना जरूरी है। वैज्ञानिक तरीकों से मत्स्य संसाधनों का प्रबंधन करने पर स्थानीय आजीविका और पर्यावरण संरक्षण के बीच बेहतर संतुलन बनाया जा सकता है।

