राजस्थान के हनुमानगढ़ में 12 से 16 अक्टूबर तक कपास कीट प्रबंधन पर पांच दिवसीय प्रशिक्षण हुआ। किसानों को IPM, जैविक नियंत्रण और ट्राइकोग्रामा की जानकारी दी गई।
राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले में किसानों को कपास और अन्य खरीफ फसलों को कीटों से बचाने के लिए वैज्ञानिक तरीके सिखाए गए। टिड्डी दल-सह-एकीकृत नाशीजीव प्रबंधन केंद्र, श्रीगंगानगर की ओर से 12 से 16 अक्टूबर 2026 तक कृषि विज्ञान केंद्र, संगरिया में पांच दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य किसानों और कृषि क्षेत्र से जुड़े कर्मचारियों को समेकित नाशीजीव प्रबंधन यानी IPM तकनीकों की व्यावहारिक जानकारी देना था।
प्रशिक्षण में कृषि पर्यवेक्षकों, किसान उत्पादक संगठनों (FPOs) के प्रतिनिधियों और किसानों ने हिस्सा लिया। प्रतिभागियों को कपास की फसल में कीटों की पहचान, उनकी निगरानी, जैविक नियंत्रण और पर्यावरण के अनुकूल कृषि पद्धतियों के बारे में जानकारी दी गई।
कपास की फसल को कीटों से बचाने के लिए सिखाईं वैज्ञानिक तकनीकें
प्रशिक्षण कार्यक्रम में कपास सहित खरीफ फसलों में कीट प्रबंधन के विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की गई। विशेषज्ञों ने बताया कि फसल में कीटों की समय पर पहचान और नियमित निगरानी से नुकसान को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है।
प्रतिभागियों को आर्थिक क्षति स्तर (Economic Threshold Level) की अवधारणा समझाई गई। इसके माध्यम से यह जानने में सहायता मिलती है कि किस स्थिति में कीट नियंत्रण के उपाय करना जरूरी हो जाता है।
इसके अलावा समेकित नाशीजीव प्रबंधन (IPM) के अंतर्गत विभिन्न नियंत्रण विधियों के समन्वित उपयोग, जैविक नियंत्रण और फसल सुरक्षा के वैज्ञानिक तरीकों की जानकारी भी दी गई।
ट्राइकोग्रामा के उपयोग और जैविक नियंत्रण पर जोर
पांच दिवसीय प्रशिक्षण में ट्राइकोग्रामा के उपयोग और वितरण से जुड़ी व्यावहारिक जानकारी भी साझा की गई। ट्राइकोग्रामा एक लाभकारी परजीवी कीट है, जिसका उपयोग कुछ हानिकारक कीटों के नियंत्रण के लिए जैविक उपाय के रूप में किया जाता है।
विशेषज्ञों ने किसानों को फसल में कीटों के प्रबंधन के लिए उपलब्ध जैविक विकल्पों के बारे में बताया। प्रशिक्षण में पर्यावरण-अनुकूल उपायों को बढ़ावा देने और जरूरत के अनुसार वैज्ञानिक पद्धतियां अपनाने पर विशेष ध्यान दिया गया।
कार्यक्रम के दौरान राष्ट्रीय पादप स्वास्थ्य प्रबंधन संस्थान के बारे में भी प्रतिभागियों को जानकारी उपलब्ध कराई गई।
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कृषि अधिकारियों की मौजूदगी में हुआ कार्यक्रम का शुभारंभ
प्रशिक्षण कार्यक्रम का उद्घाटन उप निदेशक डॉ. आर. के. शर्मा, मुख्य अतिथि श्रीमती यशवंती चौधरी, संयुक्त निदेशक, कृषि विभाग, हनुमानगढ़ तथा विशिष्ट अतिथि डॉ. अनूप कुमार, प्रभारी अधिकारी एवं वरिष्ठ वैज्ञानिक ने किया।
कार्यक्रम में कृषि विभाग के अधिकारियों और वैज्ञानिकों ने प्रतिभागियों को फसल सुरक्षा के आधुनिक तरीकों से अवगत कराया। प्रशिक्षण का उद्देश्य किसानों तक कृषि संबंधी वैज्ञानिक जानकारी पहुंचाना और खेतों में कीट प्रबंधन के बेहतर उपायों को अपनाने के लिए प्रेरित करना था।
समापन समारोह में बांटे गए प्रशिक्षण प्रमाण-पत्र
पांच दिवसीय कार्यक्रम के समापन पर जिला परिषद, हनुमानगढ़ की मुख्य कार्यकारी अधिकारी सुश्री श्रद्धा गोमे ने प्रतिभागियों को प्रशिक्षण किट और प्रमाण-पत्र वितरित किए। उन्होंने अपने अनुभव और विचार साझा करते हुए प्रतिभागियों का उत्साह बढ़ाया।
उन्होंने किसानों और कृषि क्षेत्र से जुड़े कर्मचारियों को कपास सहित अन्य खरीफ फसलों में IPM तकनीकों को अपनाने तथा वैज्ञानिक जानकारी को अधिक से अधिक किसानों तक पहुंचाने के लिए प्रोत्साहित किया। साथ ही टिकाऊ और पर्यावरण-अनुकूल कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर भी जोर दिया।
कृषि विशेषज्ञों और तकनीकी कर्मचारियों ने निभाई अहम भूमिका
प्रशिक्षण कार्यक्रम के सफल आयोजन में कृषि विभाग और तकनीकी टीम के सदस्यों का योगदान रहा। इनमें सहायक निदेशक श्री प्रकाश चंद्र, सहायक पादप संरक्षण अधिकारी जितेंद्र मीणा, अंकित कुमार जांगिड़ एवं सुश्री करीना, वैज्ञानिक सहायक आर. के. चौधरी एवं सुश्री वर्षा तथा तकनीकी सहायक सुश्री रिया चावला शामिल रहे।
इस प्रशिक्षण के माध्यम से कृषि पर्यवेक्षकों, FPO प्रतिनिधियों और किसानों को कीट प्रबंधन के वैज्ञानिक उपायों की जानकारी मिली। ऐसे कार्यक्रम किसानों को फसल सुरक्षा के बेहतर विकल्प समझने और कृषि उत्पादन को नुकसान से बचाने में मदद कर सकते हैं।

