वन अधिकार अधिनियम 2026: कोलकाता में आठ राज्यों ने लंबित दावों, वन अधिकार पत्रों, आदिवासी अधिकारों और PVTG आवास अधिकारों की समीक्षा की।
जनजातीय कार्य मंत्रालय ने 9 अक्टूबर 2026 को कोलकाता में वन अधिकार अधिनियम (FRA) के क्रियान्वयन को लेकर दूसरे क्षेत्रीय समीक्षा सम्मेलन का आयोजन किया। बैठक में आठ राज्यों के अधिकारियों ने लंबित दावों के निपटारे, वन अधिकार पत्रों को सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज करने, सामुदायिक वन संसाधन अधिकारों और विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों (PVTG) के आवास अधिकारों की प्रगति पर चर्चा की। सम्मेलन में समयबद्ध कार्ययोजना तैयार करने और पात्र आदिवासी परिवारों तक योजनाओं का लाभ पहुंचाने पर विशेष जोर दिया गया।
कोलकाता में वन अधिकार अधिनियम पर क्षेत्रीय सम्मेलन
भारत सरकार के जनजातीय कार्य मंत्रालय की ओर से आयोजित इस सम्मेलन में पश्चिम बंगाल, असम, त्रिपुरा, झारखंड, ओडिशा, बिहार, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ अधिकारियों ने भाग लिया। इसमें राजस्व एवं वन विभागों के प्रतिनिधियों के साथ जनजातीय अनुसंधान संस्थानों और उन जिलों के अधिकारियों ने भी हिस्सा लिया, जहां वन अधिकारों से जुड़े दावे बड़ी संख्या में लंबित हैं।
आंध्र प्रदेश के अधिकारियों को भी आमंत्रित किया गया, ताकि वे वन अधिकार पत्रों के डिजिटलीकरण, सरकारी रिकॉर्ड में अधिकारों को शामिल करने और लाभार्थियों को आजीविका योजनाओं तथा ऋण सुविधाओं से जोड़ने के अपने अनुभव साझा कर सकें।
यह सम्मेलन 10 सितंबर 2026 को बेंगलुरु में आयोजित दक्षिणी राज्यों की पहली क्षेत्रीय समीक्षा बैठक के बाद आयोजित किया गया।
54 लाख से अधिक दावे प्राप्त, लाखों मामले अभी लंबित
सम्मेलन में प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, 31 अगस्त 2026 तक देशभर में वन अधिकार अधिनियम के तहत 54 लाख से अधिक दावे प्राप्त हुए थे। इनमें से लगभग 25 लाख अधिकार पत्र वितरित किए जा चुके थे, जबकि करीब 11 लाख दावे अलग-अलग चरणों में लंबित थे। वहीं, 18 लाख से अधिक दावों को खारिज किया गया था।
बैठक में मध्य प्रदेश, ओडिशा और असम के कुछ जिलों में बड़ी संख्या में लंबित मामलों पर विशेष ध्यान दिया गया। अधिकारियों ने कहा कि दावों का निपटारा कानून और निर्धारित नियमों के अनुसार समय पर किया जाना चाहिए। खारिज किए गए दावों की भी नियमानुसार समीक्षा की आवश्यकता पर जोर दिया गया।
वन अधिकार पत्रों को सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज करने पर जोर
सम्मेलन में वन अधिकार अधिनियम के तहत स्वीकृत अधिकारों को राजस्व और वन विभाग के रिकॉर्ड में शामिल करने को महत्वपूर्ण प्राथमिकता बताया गया। इसके लिए संबंधित दस्तावेजों का डिजिटलीकरण, आंकड़ों में मौजूद विसंगतियों को दूर करना और अधिकार पत्रों का सटीक मानचित्रण आवश्यक माना गया।
जनजातीय कार्य मंत्रालय ने राज्यों से मासिक प्रगति रिपोर्ट में दर्ज आंकड़ों का मिलान करने और रिकॉर्ड में देरी या गलतियों को दूर करने के लिए प्रभावी कदम उठाने को कहा। इससे वन अधिकार धारकों को सरकारी योजनाओं, आवास सहायता, कृषि संबंधी कार्यक्रमों और आजीविका के अवसरों से जोड़ने में मदद मिल सकती है।
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सामुदायिक वन संसाधन अधिकारों को मजबूत करने की पहल
बैठक में सामुदायिक वन संसाधन अधिकार (CFRR) को मान्यता देने के साथ-साथ उनके प्रभावी उपयोग पर भी चर्चा हुई। अधिकारियों ने कहा कि ग्राम सभाओं को सामुदायिक वन संसाधन प्रबंधन योजनाएं तैयार करने और लागू करने के लिए आवश्यक प्रशिक्षण और तकनीकी सहयोग उपलब्ध कराया जाना चाहिए।
जनजातीय कार्य मंत्रालय की सचिव ने ओडिशा और छत्तीसगढ़ में वन अधिकारों की मान्यता से जुड़े प्रयासों की सराहना की। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि सामुदायिक वन संसाधनों के प्रबंधन में ग्राम सभाओं की भूमिका को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
इसके लिए जनजातीय कार्य मंत्रालय और पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की संयुक्त सलाह के अनुरूप वन विभाग की कार्ययोजनाओं के साथ ग्राम सभाओं की प्रबंधन योजनाओं का समन्वय करने की आवश्यकता बताई गई। धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान (DA-JGUA) के अंतर्गत ग्राम सभाओं की क्षमता बढ़ाने के लिए उपलब्ध सहायता का भी उल्लेख किया गया।
PVTG समुदायों के आवास अधिकारों पर विशेष ध्यान
सम्मेलन में विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों (PVTG) के पारंपरिक आवास क्षेत्रों से जुड़े अधिकारों की मान्यता को भी महत्वपूर्ण विषय के रूप में शामिल किया गया।
अधिकारियों ने सुझाव दिया कि प्रत्येक संबंधित जनजातीय समूह के लिए स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार स्पष्ट कार्ययोजना बनाई जाए। इस प्रक्रिया में पारंपरिक संस्थाओं, ग्राम सभाओं और संबंधित गांवों के समुदायों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए।
बैठक में यह भी कहा गया कि मान्यता प्राप्त अधिकारों को सटीक नक्शों के साथ सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज किया जाए, ताकि लाभार्थियों को भूमि उपयोग, आवास और आजीविका से जुड़ी सरकारी योजनाओं का लाभ प्राप्त करने में आसानी हो।
डिजिटल तकनीक से वन अधिकार प्रक्रिया को बनाया जाएगा आसान
सम्मेलन में वन अधिकार रिकॉर्ड के डिजिटलीकरण पर भी प्रस्तुति दी गई। जनजातीय कार्य मंत्रालय के अधिकारियों ने राष्ट्रीय वन अधिकार पोर्टल और FRA मोबाइल ऐप की उपयोगिता बताई। इन डिजिटल माध्यमों से दस्तावेजों का प्रबंधन, भौगोलिक जानकारी का एकीकरण और निर्णय लेने की प्रक्रिया को बेहतर बनाने में सहायता मिल सकती है।
राज्यों को अपने मौजूदा वन अधिकार रिकॉर्ड को एप्लिकेशन प्रोग्रामिंग इंटरफेस (API) के माध्यम से राष्ट्रीय स्तर की डिजिटल व्यवस्था से जोड़ने के लिए प्रोत्साहित किया गया। इसका उद्देश्य जानकारी को व्यवस्थित करना, रिकॉर्ड तक पहुंच आसान बनाना और दावों की स्थिति की निगरानी को अधिक प्रभावी बनाना है।
राज्यों को समयबद्ध कार्ययोजना बनाने के निर्देश
राज्य प्रतिनिधियों ने अपने-अपने क्षेत्रों में वन अधिकार अधिनियम के क्रियान्वयन की स्थिति साझा की। प्रस्तुतियों में लंबित दावों, खारिज मामलों की समीक्षा, अधिकार पत्रों को सरकारी रिकॉर्ड में शामिल करने, सामुदायिक वन संसाधन अधिकारों और PVTG आवास अधिकारों से संबंधित प्रगति की जानकारी दी गई।
बैठक में ग्राम सभाओं को जागरूक बनाने, पात्र दावेदारों की पहचान करने और आजीविका योजनाओं के साथ वन अधिकारों का समन्वय बढ़ाने के लिए कार्ययोजना तैयार करने पर सहमति जताई गई।
सम्मेलन का समापन जनजातीय कार्य मंत्रालय के संयुक्त सचिव के संबोधन और वन अधिकार प्रभाग के निदेशक के धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ।
वन अधिकार अधिनियम का प्रभावी क्रियान्वयन क्यों जरूरी है?
वन अधिकार अधिनियम, 2006 का उद्देश्य अनुसूचित जनजातियों और अन्य पारंपरिक वनवासियों के पात्र वन अधिकारों को मान्यता देना है। इसके प्रभावी क्रियान्वयन से भूमि और वन संसाधनों से जुड़े अधिकारों की सुरक्षा, सामुदायिक भागीदारी और आजीविका के अवसरों को मजबूत करने में मदद मिल सकती है।
कोलकाता में आयोजित यह समीक्षा सम्मेलन लंबित दावों के समाधान, डिजिटल रिकॉर्ड प्रबंधन और ग्राम सभाओं की भागीदारी बढ़ाने की दिशा में राज्यों के बीच समन्वय मजबूत करने का प्रयास है। आने वाले समय में जिला स्तर पर समयबद्ध कार्रवाई और नियमित निगरानी इस प्रक्रिया की सफलता के लिए महत्वपूर्ण होगी।

