बदलते मौसम में चने की बंपर पैदावार के लिए सही बुवाई समय, उन्नत किस्म, बीज उपचार, सिंचाई और कीट-रोग नियंत्रण की जरूरी जानकारी यहां जानें।
चना देश में उगाई जाने वाली प्रमुख दलहनी फसलों में शामिल है। उत्तर और मध्य भारत के कई हिस्सों में किसान इसकी खेती बड़े स्तर पर करते हैं। बदलते मौसम, तापमान में उतार-चढ़ाव और असमय बारिश जैसी परिस्थितियों में चने की उत्पादकता बनाए रखना किसानों के लिए चुनौती बन सकता है।
ऐसे में सही समय पर बुवाई, क्षेत्र के अनुसार उन्नत किस्म का चयन, बीज उपचार, संतुलित पोषण और समय पर कीट-रोग प्रबंधन अपनाकर किसान फसल की क्षमता का बेहतर उपयोग कर सकते हैं।
चने की बुवाई के लिए कैसा मौसम जरूरी?
चने की फसल के लिए ठंडा और अपेक्षाकृत शुष्क मौसम अनुकूल माना जाता है। जिन क्षेत्रों में सालाना करीब 60 से 90 सेंटीमीटर बारिश होती है, वहां चने की खेती अच्छी तरह की जा सकती है।
पौधों की वृद्धि के लिए करीब 24 से 30 डिग्री सेल्सियस तापमान उपयुक्त माना जाता है। बुवाई का समय सिंचाई की सुविधा और क्षेत्र की जलवायु के अनुसार तय करना चाहिए।
चने की बुवाई का सही समय
सिंचित क्षेत्र: 20 अक्टूबर से 15 नवंबर तक।
सबसे उपयुक्त अवधि: 25 अक्टूबर से 5 नवंबर।
असिंचित क्षेत्र: अक्टूबर के दूसरे पखवाड़े में उपलब्ध नमी का लाभ लेते हुए।
देर से बुवाई: GNG 2144 जैसी किस्मों के साथ दिसंबर के शुरुआती दिनों तक बुवाई की जा सकती है।
अच्छी पैदावार के लिए इन उन्नत किस्मों का करें चयन
चने की किस्म का चुनाव क्षेत्र, सिंचाई की उपलब्धता, बुवाई के समय और रोग की स्थिति को ध्यान में रखकर करना चाहिए।
| किस्म | प्रकार | पकने की अवधि | औसत पैदावार |
|---|---|---|---|
| GNG 2171 (मीरा) | देसी, सिंचित | 150 दिन | 24 क्विंटल/हेक्टेयर |
| GNG 1958 (मरुधर) | देसी, सिंचित | 145 दिन | 25 क्विंटल/हेक्टेयर |
| GNG 1581 (गणगौर) | देसी | 145-150 दिन | 24 क्विंटल/हेक्टेयर |
| RVG 202 | देसी, पाला सहनशील | 130-135 दिन | 22-25 क्विंटल/हेक्टेयर |
| RSG 888 | असिंचित क्षेत्र | 141 दिन | 21 क्विंटल/हेक्टेयर |
| GNG 2144 (तीज) | देर से बुवाई | 130-135 दिन | 23 क्विंटल/हेक्टेयर |
| GNG 1488 (संगम) | देसी, चिकना बीज | 130-135 दिन | 18 क्विंटल/हेक्टेयर |
| GNG 1969 (त्रिवेणी) | काबुली | 146 दिन | 22 क्विंटल/हेक्टेयर |
| GNG 1499 (गौरी) | काबुली | 143 दिन | 18 क्विंटल/हेक्टेयर |
| GNG 1292 | काबुली, रोग सहनशील | 147 दिन | 23-25 क्विंटल/हेक्टेयर |
| JAKI 9218, विशाल, JG 14 | कम अवधि/उखटा सहनशील | 110-120 दिन | 20-24 क्विंटल/हेक्टेयर |
किसान अपने क्षेत्र की कृषि जलवायु और उपलब्ध सिंचाई के अनुसार किस्म का चयन करें। स्थानीय कृषि विशेषज्ञ की सलाह लेना भी उपयोगी रहेगा।
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बीज की मात्रा और बुवाई की दूरी का रखें ध्यान
चने की खेती में बीज की दर किस्म और दाने के आकार के अनुसार अलग-अलग रखी जाती है।
- सामान्य देसी चना: करीब 60 किलोग्राम/हेक्टेयर।
- बड़े दाने वाली किस्में: लगभग 75-85 किलोग्राम/हेक्टेयर।
- काबुली चना: करीब 100 किलोग्राम/हेक्टेयर।
कतारों के बीच लगभग 30 सेंटीमीटर दूरी रखने की सलाह दी जाती है। सामान्य सिंचित परिस्थितियों में बीज को करीब 7 सेंटीमीटर गहराई पर बोया जा सकता है। उखटा प्रभावित क्षेत्रों में अपेक्षाकृत गहरी बुवाई उपयोगी हो सकती है।
बुवाई से पहले बीज उपचार क्यों जरूरी?
बदलते मौसम में फफूंदजनित रोगों का खतरा बढ़ सकता है। इसलिए बुवाई से पहले बीज उपचार पर विशेष ध्यान देना चाहिए। बीज उपचार के लिए ट्राइकोडर्मा या अनुशंसित फफूंदनाशी का इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके बाद राइजोबियम और पीएसबी कल्चर से बीज उपचार करने से जैविक रूप से पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ाने में मदद मिल सकती है। किसी भी जैविक या रासायनिक उपचार की मात्रा उत्पाद के लेबल और स्थानीय कृषि विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार ही रखें।
चने में सिंचाई कब करें?
चना अपेक्षाकृत कम पानी में तैयार होने वाली फसल है। जरूरत से ज्यादा सिंचाई करने पर जड़ संबंधी रोग और अन्य समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है।
सामान्य तौर पर:
पहली सिंचाई: करीब 30-45 दिन या परिस्थितियों के अनुसार 50-55 दिन बाद, शाखाएं बनने के समय।
दूसरी सिंचाई: दाना भरने के चरण में, लगभग 90-100 दिन बाद।
फूल आने के दौरान अनावश्यक सिंचाई से बचना चाहिए। यदि केवल एक सिंचाई उपलब्ध है, तो फसल की स्थिति और मिट्टी की नमी के अनुसार लगभग 50-60 दिन के आसपास सिंचाई करना उपयोगी हो सकता है।
खाद और उर्वरक प्रबंधन से बढ़ सकती है फसल की क्षमता
बुवाई से पहले खेत में पर्याप्त जैविक खाद का इस्तेमाल मिट्टी की संरचना सुधारने में मदद कर सकता है। दिए गए कृषि प्रबंधन के अनुसार प्रति हेक्टेयर करीब 15 टन गोबर की खाद या उचित मात्रा में वर्मीकंपोस्ट का प्रयोग किया जा सकता है।
इसके साथ नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश, सल्फर और जिंक की जरूरत फसल एवं मिट्टी की जांच के आधार पर पूरी करनी चाहिए। उर्वरकों की वास्तविक मात्रा मिट्टी परीक्षण और स्थानीय कृषि सिफारिशों के अनुसार तय करना बेहतर है।
फसल की बढ़वार और दाना भरने के चरण में पर्णीय पोषण का उपयोग भी किया जा सकता है, लेकिन किसी भी मिश्रण या स्प्रे से पहले उत्पाद की अनुशंसित मात्रा और संगतता की जांच जरूरी है।
फली छेदक से चने की फसल को कैसे बचाएं?
चने में फली छेदक इल्ली (Helicoverpa armigera) प्रमुख कीटों में से एक है। बदलते मौसम में इसकी निगरानी और समय पर नियंत्रण महत्वपूर्ण हो जाता है।
किसान एकीकृत कीट प्रबंधन के तहत:
- खेत में अनुशंसित संख्या में फेरोमोन ट्रैप लगा सकते हैं।
- पक्षियों के बैठने के लिए T आकार की खूंटियां लगाई जा सकती हैं।
- शुरुआती प्रकोप में नीम आधारित जैविक उपायों का इस्तेमाल किया जा सकता है।
- अधिक प्रकोप होने पर कृषि विशेषज्ञ की सलाह से पंजीकृत एवं अनुशंसित कीटनाशक का प्रयोग करें।
कीटनाशक का चयन और मात्रा स्थानीय कृषि विभाग की सलाह तथा उत्पाद के लेबल के अनुसार ही तय करें।
उखटा और झुलसा रोग से बचाव के उपाय
चने में उखटा रोग फसल के लिए गंभीर समस्या बन सकता है। इसके जोखिम को कम करने के लिए क्षेत्र के अनुसार रोग-सहनशील किस्मों का चयन, उचित फसल चक्र और बीज उपचार पर ध्यान देना चाहिए।
झुलसा या एस्कोकाइटा ब्लाइट जैसे रोगों के लक्षण दिखाई देने पर खेत का निरीक्षण कर उचित फफूंदनाशी का इस्तेमाल कृषि विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार करें।
बदलते मौसम में इन बातों का रखें ध्यान
चने की बेहतर फसल के लिए केवल अच्छी किस्म का चुनाव पर्याप्त नहीं है। किसान को समय पर बुवाई, बीज उपचार, संतुलित पोषण, नियंत्रित सिंचाई और नियमित कीट-रोग निगरानी पर एक साथ ध्यान देना चाहिए।
मौसम में अचानक बदलाव होने पर खेत की स्थिति की लगातार निगरानी करें। किसी भी दवा या उर्वरक का इस्तेमाल स्थानीय कृषि सलाह और उत्पाद के निर्धारित निर्देशों के अनुसार करना सुरक्षित और प्रभावी रहता है।

