बाजरे की खेती के लिए बीकानेर कृषि विश्वविद्यालय ने BHP 1202 और BHP 1602 हाइब्रिड किस्में विकसित की हैं। जानें इनकी खासियत और खेती के सुझाव।
पश्चिमी राजस्थान के शुष्क इलाकों में खेती करने वाले किसानों के लिए बाजरे की उन्नत किस्में बेहतर विकल्प बन सकती हैं। कम बारिश, सीमित सिंचाई और मिट्टी में नमी की कमी जैसी चुनौतियों के बीच कम समय में पकने वाली तथा अच्छी पैदावार देने वाली किस्मों की मांग बढ़ रही है। इसी दिशा में बीकानेर स्थित स्वामी केशवानंद राजस्थान कृषि विश्वविद्यालय में बाजरे की हाइब्रिड किस्मों पर अनुसंधान किया जा रहा है।
विश्वविद्यालय के बाजरा अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान परियोजना केंद्र ने बीएचपी 1202 और बीएचपी 1602 नाम की दो हाइब्रिड किस्में विकसित की हैं। इसके अलावा आरएचबी 233 और आरएचबी 234 किस्मों की उत्पादन क्षमता को भी महत्वपूर्ण बताया गया है। अनुसंधान का उद्देश्य शुष्क क्षेत्रों की कृषि परिस्थितियों के अनुरूप ऐसी किस्मों को बढ़ावा देना है, जो किसानों को उपलब्ध पानी और समय का बेहतर उपयोग करने में मदद कर सकें।
बीकानेर कृषि विश्वविद्यालय में विकसित हुईं बाजरे की दो हाइब्रिड किस्में
स्वामी केशवानंद राजस्थान कृषि विश्वविद्यालय, बीकानेर में बाजरे की उत्पादकता बढ़ाने के लिए लगातार अनुसंधान किया जा रहा है। विश्वविद्यालय के अनुसंधान अधिकारी डॉ. एन.के. शर्मा के अनुसार, यहां संचालित अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान परियोजना के तहत बीएचपी 1202 और बीएचपी 1602 हाइब्रिड किस्में विकसित की गई हैं।
इन किस्मों को क्षेत्र की जलवायु और कृषि परिस्थितियों को ध्यान में रखकर विकसित करने पर काम किया गया है। इनके अतिरिक्त आरएचबी 233 और आरएचबी 234 किस्मों को भी अच्छी उत्पादन क्षमता वाली किस्मों के रूप में बताया गया है।
हाइब्रिड बाजरे की किस्मों का चयन किसानों को बेहतर उत्पादन की संभावनाएं दे सकता है। हालांकि, वास्तविक उपज खेत की मिट्टी, वर्षा, सिंचाई, बीज की गुणवत्ता और फसल प्रबंधन जैसे कारकों पर निर्भर करती है।
70 से 75 दिन में पकने वाले बाजरे पर अनुसंधान
शुष्क क्षेत्रों में जल्दी तैयार होने वाली फसलें किसानों के लिए विशेष महत्व रखती हैं। पश्चिमी राजस्थान में बारिश अनियमित रहने और खेतों में नमी सीमित होने के कारण फसल की अवधि का सही चुनाव जरूरी होता है।
डॉ. एन.के. शर्मा के अनुसार, बाजरे की विभिन्न किस्मों को पकने में लगभग 65 से 70 दिन से लेकर 90 से 95 दिन तक लग सकते हैं। ऐसे में 70 से 75 दिन में तैयार होने वाली किस्में शुष्क क्षेत्रों के लिए उपयोगी विकल्प हो सकती हैं।
कम अवधि में तैयार होने वाली फसल उपलब्ध नमी का बेहतर उपयोग करने का अवसर दे सकती है। साथ ही, समय पर पकने वाली किस्मों का चयन किसानों को स्थानीय मौसम और बुवाई की परिस्थितियों के अनुसार खेती की योजना बनाने में मदद कर सकता है।
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कम पानी वाले क्षेत्रों में बाजरे की खेती क्यों है महत्वपूर्ण?
बाजरा राजस्थान के शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों की प्रमुख खाद्यान्न फसलों में शामिल है। इसकी खेती कम पानी वाली परिस्थितियों में भी की जा सकती है, इसलिए पश्चिमी राजस्थान के अनेक किसानों के लिए इसका विशेष महत्व है।
जहां सिंचाई की सुविधा उपलब्ध है, वहां किसान उत्पादन क्षमता और स्थानीय कृषि परिस्थितियों के अनुरूप हाइब्रिड किस्मों का चयन कर सकते हैं। वहीं, बारिश पर निर्भर क्षेत्रों में कम अवधि में पकने वाली किस्मों को प्राथमिकता देना उपयोगी हो सकता है।
हालांकि, केवल कम समय में पकने के आधार पर बीज का चुनाव नहीं करना चाहिए। किसानों को अपने क्षेत्र की वर्षा, मिट्टी की प्रकृति, बुवाई के समय और संबंधित किस्म की अनुशंसित परिस्थितियों की जानकारी भी लेनी चाहिए।
बाजरे की किस्म चुनते समय इन बातों का रखें ध्यान
बाजरे की खेती से बेहतर परिणाम प्राप्त करने के लिए किसानों को अपने खेत की परिस्थितियों के अनुसार बीज का चयन करना चाहिए। सही किस्म चुनने से उपलब्ध संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल करने में मदद मिल सकती है।
- वर्षा और सिंचाई: खेत में पानी की उपलब्धता के अनुसार उपयुक्त किस्म चुनें।
- फसल की अवधि: बारिश पर निर्भर खेती में जल्दी पकने वाली किस्मों की उपयोगिता पर विचार करें।
- उत्पादन क्षमता: स्थानीय कृषि विश्वविद्यालय या कृषि विभाग की अनुशंसित किस्मों की जानकारी लें।
- मिट्टी और जलवायु: अपने क्षेत्र की मिट्टी और मौसम के अनुकूल बीज का चयन करें।
- बीज की गुणवत्ता: प्रमाणित स्रोत से बीज खरीदें और बुवाई से पहले किस्म की जानकारी जांचें।
राज 171, जेवीवी-2 और दाह शक्ति किस्मों का भी उल्लेख
डॉ. एन.के. शर्मा ने बाजरे की खेती के संदर्भ में राज 171, जेवीवी-2 और दाह शक्ति जैसी किस्मों का भी उल्लेख किया। किसानों को सलाह दी जाती है कि वे इन किस्मों की उपयुक्तता और अनुशंसित क्षेत्र के बारे में स्थानीय कृषि विशेषज्ञों से जानकारी प्राप्त करें।
हर किस्म का प्रदर्शन सभी क्षेत्रों में एक जैसा नहीं होता। इसलिए बीज खरीदने से पहले उसकी विशेषताओं, पकने की अवधि, संभावित उत्पादन और क्षेत्रीय अनुशंसा की पुष्टि करना जरूरी है।
उन्नत बाजरा किस्मों से किसानों को मिल सकते हैं नए विकल्प
बाजरे की हाइब्रिड किस्मों पर किया जा रहा अनुसंधान शुष्क क्षेत्रों में खेती की चुनौतियों को ध्यान में रखता है। बीकानेर स्थित स्वामी केशवानंद राजस्थान कृषि विश्वविद्यालय में विकसित बीएचपी 1202 और बीएचपी 1602 जैसी किस्में इस दिशा में महत्वपूर्ण अनुसंधान का हिस्सा हैं।
कम अवधि में पकने वाली और स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल किस्मों का चयन किसानों को उपलब्ध पानी और कृषि संसाधनों का बेहतर उपयोग करने में मदद कर सकता है। हालांकि, इन किस्मों की बुवाई से पहले कृषि विश्वविद्यालय या स्थानीय कृषि विभाग से उनकी वर्तमान उपलब्धता और क्षेत्र के लिए आधिकारिक अनुशंसा की पुष्टि करना जरूरी है।

