ICAR-VPKAS अल्मोड़ा की VL मंडुआ 400 रागी किस्म 100 दिन से कम में तैयार होती है। जानें इसकी उपज क्षमता, सूखा सहनशीलता, कैल्शियम और बीज वितरण की जानकारी।
जलवायु परिवर्तन और अनियमित बारिश के बीच रागी (मंडुआ) की उन्नत किस्म ‘VL मंडुआ 400’ किसानों के लिए एक उपयोगी विकल्प बनकर उभर रही है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के विवेकानंद पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (VPKAS), अल्मोड़ा द्वारा विकसित यह किस्म कर्नाटक के किसानों के बीच लोकप्रिय हो रही है। कम अवधि में पकने, बेहतर दाना उत्पादन और सूखे जैसी परिस्थितियों में प्रदर्शन करने की क्षमता इसकी प्रमुख विशेषताएं हैं।
खरीफ 2026 के दौरान कम बारिश और मौसम संबंधी चुनौतियों के बीच इस किस्म ने किसानों का ध्यान आकर्षित किया है। इसके बीजों के उत्पादन और वितरण में राष्ट्रीय बीज निगम (NSC), दावणगेरे और VPKAS अल्मोड़ा की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इस पहल का उद्देश्य किसानों तक गुणवत्तापूर्ण बीज पहुंचाना और जलवायु के अनुकूल खेती को प्रोत्साहित करना है।
100 दिन से कम समय में पककर तैयार होती है VL मंडुआ 400
VL मंडुआ 400 की सबसे बड़ी खासियत इसका कम समय में तैयार होना है। यह किस्म सामान्य परिस्थितियों में 100 दिन से भी कम समय में पक जाती है। कम अवधि में फसल तैयार होने से वर्षा आधारित खेती करने वाले किसानों को मौसम के अंतिम चरण में होने वाली बारिश की कमी से होने वाले नुकसान का जोखिम कम करने में मदद मिल सकती है।
इस किस्म की बालियां भी अधिक सघन होती हैं। स्थानीय स्तर पर उगाई जाने वाली कुछ पारंपरिक किस्मों की तुलना में इसकी बालियों की बनावट बेहतर बताई गई है। जल्दी पकने और सघन बालियों जैसी विशेषताएं इसे उन क्षेत्रों के लिए उपयोगी बनाती हैं, जहां बारिश अनिश्चित रहती है।
सूखे और कम बारिश में भी दिखाया बेहतर प्रदर्शन
कर्नाटक में खरीफ 2026 के दौरान वर्षा की कमी और अल नीनो से जुड़ी मौसमी चुनौतियों के बावजूद VL मंडुआ 400 के बीज उत्पादन से जुड़े किसानों ने इसके प्रदर्शन पर संतोष जताया है।
राष्ट्रीय बीज निगम, दावणगेरे से मिली जानकारी के अनुसार, इस खरीफ सीजन में लगभग 70 हेक्टेयर क्षेत्र में इस किस्म का बीज उत्पादन किया गया। इस कार्य में किसान उत्पादक संगठनों (FPO) से जुड़े 92 लघु एवं सीमांत किसानों ने भाग लिया।
कम अवधि में पकने वाली फसल होने के कारण यह किस्म मौसम के आखिरी हिस्से में पड़ने वाले सूखे के जोखिम को कम करने में सहायक हो सकती है। हालांकि, वास्तविक उपज और फसल का प्रदर्शन स्थानीय मिट्टी, वर्षा, सिंचाई तथा कृषि प्रबंधन पर भी निर्भर करेगा।
मानक किस्म से 11.5 प्रतिशत अधिक औसत उपज
VL मंडुआ 400 की उत्पादकता को लेकर भी उत्साहजनक आंकड़े सामने आए हैं। अखिल भारतीय समन्वित लघु धान्य अनुसंधान परियोजना के तहत 40 स्थानों पर किए गए मूल्यांकन में इसकी औसत दाना उपज 34.77 क्विंटल प्रति हेक्टेयर दर्ज की गई।
तुलना के लिए इस्तेमाल की गई मानक किस्म VL मंडुआ 376 की औसत उपज 31.11 क्विंटल प्रति हेक्टेयर रही। इन आंकड़ों के अनुसार, VL मंडुआ 400 की औसत उपज मानक किस्म से लगभग 11.5 प्रतिशत अधिक रही।
बेहतर उत्पादकता की यह क्षमता किसानों को सीमित कृषि संसाधनों का अधिक प्रभावी उपयोग करने में मदद कर सकती है। हालांकि, किसानों को अपने क्षेत्र की कृषि-जलवायु परिस्थितियों के अनुरूप किस्म का चयन करना चाहिए।
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कैल्शियम से भरपूर है रागी की यह उन्नत किस्म
VL मंडुआ 400 की विशेषताएं केवल खेती तक सीमित नहीं हैं। पोषण के लिहाज से भी यह महत्वपूर्ण है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इसके 100 ग्राम दानों में लगभग 399.5 मिलीग्राम कैल्शियम पाया जाता है।
रागी पहले से ही कैल्शियम और अन्य पोषक तत्वों के लिए जानी जाती है। ऐसे में अधिक कैल्शियम वाली यह किस्म पौष्टिक अनाजों की उपलब्धता बढ़ाने और संतुलित आहार को प्रोत्साहित करने में योगदान दे सकती है।
इसका बेहतर उत्पादन और पोषण संबंधी महत्व किसानों की आमदनी के साथ उपभोक्ताओं के लिए भी उपयोगी साबित हो सकता है।
650 क्विंटल बीज किसानों तक पहुंचाने की जानकारी
VL मंडुआ 400 की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए राष्ट्रीय बीज निगम, दावणगेरे ने बीज वितरण की व्यवस्था की है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, लगभग 500 क्विंटल बीज सीधे बेचे गए, जबकि अतिरिक्त 150 क्विंटल बीज डीलरों के माध्यम से किसानों तक पहुंचाए गए।
करीब 70 हेक्टेयर में बीज उत्पादन और 92 किसानों की भागीदारी इस किस्म के प्रसार में संस्थागत सहयोग की भूमिका को दर्शाती है। गुणवत्तापूर्ण बीजों की समय पर उपलब्धता किसानों को नई किस्मों को अपनाने और खेती में बेहतर परिणाम प्राप्त करने के अवसर दे सकती है।
कर्नाटक में किसान क्षेत्र दिवस आयोजित करने की तैयारी
इस किस्म की उपयोगिता के बारे में किसानों को प्रत्यक्ष जानकारी देने के लिए राष्ट्रीय बीज निगम, दावणगेरे ने कर्नाटक के विजयनगर जिले के उज्जैनी गांव में किसान क्षेत्र दिवस आयोजित करने का प्रस्ताव रखा है।
प्रस्तावित कार्यक्रम में किसान खेतों में फसल का प्रदर्शन देख सकेंगे। इसके साथ ही उन्हें कृषि वैज्ञानिकों से बातचीत करने, किस्म की विशेषताओं को समझने और खेती से जुड़े अपने अनुभव साझा करने का अवसर मिलेगा।
ऐसे कार्यक्रमों से किसानों को नई कृषि तकनीकों और उन्नत बीजों की जानकारी हासिल करने में मदद मिलती है। साथ ही, वैज्ञानिक अनुसंधान के निष्कर्षों को खेतों तक पहुंचाने का रास्ता भी मजबूत होता है।
किसानों की आय और पोषण सुरक्षा के लिए उपयोगी पहल
VPKAS के निदेशक डॉ. लक्ष्मी कान्त के अनुसार, अधिक कैल्शियम, बेहतर उत्पादकता और कम समय में पकने जैसी विशेषताओं का संयोजन किसानों की आय बढ़ाने और पोषण सुरक्षा को मजबूत करने की संभावनाएं रखता है।
VL मंडुआ 400 जैसी उन्नत किस्मों का प्रसार यह दिखाता है कि कृषि अनुसंधान संस्थानों, बीज वितरण एजेंसियों और किसानों के बीच बेहतर तालमेल से नई तकनीक को खेतों तक पहुंचाया जा सकता है।
जलवायु परिवर्तन के दौर में कम अवधि में तैयार होने वाली और बेहतर उत्पादन क्षमता रखने वाली फसलों का महत्व बढ़ रहा है। ऐसे में रागी की यह किस्म किसानों को फसल विकल्पों में विविधता लाने का अवसर दे सकती है। इसके वास्तविक लाभ स्थानीय परिस्थितियों, बीज की उपलब्धता और उचित कृषि प्रबंधन पर निर्भर करेंगे।

