छिंदवाड़ा की लक्ष्मी बाई घाघरे ने जैविक खेती, डेयरी व्यवसाय और नमो ड्रोन दीदी योजना से अपनी आय बढ़ाई और ग्रामीण महिलाओं के लिए प्रेरणा बनीं।
मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले के बिछुआ विकासखंड स्थित ग्राम झांमटा की लक्ष्मी बाई घाघरे ग्रामीण महिला सशक्तिकरण और आत्मनिर्भरता की एक प्रेरक मिसाल बनकर उभरी हैं। उन्होंने खेती, पशुपालन, दुग्ध उत्पादन और आधुनिक कृषि तकनीक को अपनी आजीविका का हिस्सा बनाकर आर्थिक प्रगति की नई राह तैयार की है। मध्यप्रदेश राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन के अंतर्गत स्व सहायता समूह से जुड़ने के बाद उन्होंने अपने काम का विस्तार किया और आज सफल डेयरी व्यवसायी, जैविक खेती करने वाली प्रगतिशील कृषक तथा नमो ड्रोन दीदी के रूप में पहचान बना चुकी हैं।
लक्ष्मी बाई की इस पहल से उनकी आय में वृद्धि हुई है। साथ ही, उनके प्रयासों से क्षेत्र की अन्य महिलाओं को भी रोजगार और स्वरोजगार के अवसर मिल रहे हैं। कृषि क्षेत्र में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए उन्हें प्रदेश स्तर पर प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया जा चुका है।
स्व सहायता समूह ने दिखाई आत्मनिर्भरता की राह
लक्ष्मी बाई घाघरे के आर्थिक विकास में स्व सहायता समूह की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। समूह से जुड़ने के बाद उन्हें प्रशिक्षण, सहयोग और अपनी क्षमताओं को निखारने के अवसर मिले। उन्होंने इन अवसरों का लाभ उठाते हुए खेती और पशुपालन के साथ कई अन्य आजीविका गतिविधियां शुरू कीं।
वे स्व सहायता समूह की अध्यक्ष होने के साथ संकुल स्तरीय संगठन से भी जुड़ी हुई हैं। इस भूमिका में वे ग्रामीण महिलाओं को स्वरोजगार अपनाने और आर्थिक गतिविधियों में भागीदारी बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित करती हैं। उनके नेतृत्व में समूह बचत तक सीमित नहीं रहा, बल्कि महिलाओं के लिए आय अर्जित करने और आत्मनिर्भर बनने का माध्यम बना है।
डेयरी कारोबार से हर महीने 90 हजार से 1 लाख रुपये तक की आय
लक्ष्मी बाई ने पशुपालन को व्यवस्थित व्यावसायिक गतिविधि के रूप में विकसित किया है। उनके पास लगभग 10 पशु हैं, जिनसे रोजाना 30 से 35 लीटर दूध का उत्पादन होता है। वे केवल कच्चा दूध बेचने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि दूध से घी, पनीर, दही और मिठाइयां तैयार करके भी बाजार में बिक्री करती हैं।
इसके अलावा, वे आसपास की महिलाओं से दूध एकत्रित कर डेयरी संघ तक पहुंचाती हैं। इस काम को अधिक व्यवस्थित बनाने के लिए उन्होंने दुग्ध उत्पादक समूह भी बनाया है। इससे स्थानीय महिलाओं को दूध के उत्पादन और विपणन के जरिए कमाई करने का अवसर मिला है।
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, लक्ष्मी बाई को डेयरी व्यवसाय से प्रतिमाह लगभग 90 हजार से एक लाख रुपये तक की आय प्राप्त हो रही है। उनकी विभिन्न आजीविका गतिविधियों से वार्षिक आय चार लाख रुपये से अधिक हो चुकी है। उनका यह प्रयास ग्रामीण क्षेत्रों में पशुपालन को लाभकारी व्यवसाय बनाने की संभावनाओं को दर्शाता है।
जैविक खेती और फसल विविधीकरण से बढ़ाए कमाई के अवसर
खेती में बेहतर परिणाम हासिल करने के लिए लक्ष्मी बाई पारंपरिक कृषि अनुभव के साथ जैविक पद्धतियों और फसल विविधीकरण पर भी ध्यान दे रही हैं। उन्होंने बायो इनपुट रिसोर्स सेंटर स्थापित किया है, जहां जैविक खाद और कीट नियंत्रण में उपयोग होने वाली सामग्री तैयार की जाती है।
वे मिश्रित खेती और अंतर्वर्ती फसल प्रणाली के माध्यम से कृषि भूमि का बेहतर इस्तेमाल करती हैं। तुअर के साथ गेंदे की खेती और सोयाबीन के साथ धनिया उगाना उनकी कृषि पद्धति के प्रमुख उदाहरण हैं।
एक ही खेत में अलग-अलग फसलों को उचित तरीके से उगाने से उन्हें अतिरिक्त आय के अवसर विकसित करने और खेती के संसाधनों का बेहतर उपयोग करने में मदद मिल रही है। उनके ये प्रयोग दूसरे किसानों को भी फसल विविधीकरण और वैकल्पिक कृषि पद्धतियां अपनाने के लिए प्रेरित कर सकते हैं।
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नमो ड्रोन दीदी बनकर आधुनिक कृषि तकनीक से जुड़ीं लक्ष्मी बाई
लक्ष्मी बाई घाघरे ने आधुनिक कृषि तकनीक को अपनाकर अपनी आजीविका में एक नया आय स्रोत भी जोड़ा है। भारत सरकार की नमो ड्रोन दीदी योजना के अंतर्गत चयनित होने के बाद उन्होंने ड्रोन संचालन का प्रशिक्षण प्राप्त किया।
अब वे कृषि कार्यों में ड्रोन के माध्यम से फसलों पर कृषि दवाओं के छिड़काव जैसी सेवाएं प्रदान करती हैं। इस गतिविधि से उन्हें सालाना करीब 70 हजार रुपये की अतिरिक्त आय प्राप्त हो रही है।
ड्रोन तकनीक से जुड़ने के बाद उनके काम का दायरा बढ़ा है। इसके साथ ही, वे खेती में आधुनिक उपकरणों के उपयोग और कृषि सेवाओं के क्षेत्र में भी अपनी भागीदारी बढ़ा रही हैं। उनकी यह पहल बताती है कि प्रशिक्षण और तकनीकी जानकारी मिलने पर ग्रामीण महिलाएं कृषि क्षेत्र में नए व्यवसाय विकसित कर सकती हैं।
दूसरी महिलाओं को भी दे रही हैं आगे बढ़ने की प्रेरणा
लक्ष्मी बाई की सफलता का महत्व केवल उनकी व्यक्तिगत आर्थिक उपलब्धियों तक सीमित नहीं है। वे अपने अनुभव साझा करके दूसरी महिलाओं को जैविक खेती, पशुपालन, फसल विविधीकरण और आधुनिक कृषि तकनीकों के बारे में जागरूक करती हैं।
दुग्ध उत्पादक समूह के जरिए महिलाओं को आय अर्जित करने के अवसर उपलब्ध कराने के साथ वे उन्हें स्थानीय संसाधनों का सही उपयोग करने के लिए भी प्रेरित करती हैं। उनका मानना है कि आजीविका के अलग-अलग साधनों को अपनाकर महिलाएं आर्थिक रूप से अधिक मजबूत बन सकती हैं।
ग्रामीण महिला सशक्तिकरण की मिसाल बनीं लक्ष्मी बाई घाघरे
छिंदवाड़ा की लक्ष्मी बाई घाघरे की उपलब्धियां दर्शाती हैं कि स्व सहायता समूहों से मिलने वाला सहयोग, व्यावसायिक प्रशिक्षण और आधुनिक तकनीक ग्रामीण महिलाओं के लिए विकास के नए रास्ते खोल सकते हैं।
उन्होंने डेयरी व्यवसाय, जैविक खेती और ड्रोन आधारित कृषि सेवाओं को एक साथ जोड़कर अपनी आजीविका का विस्तार किया है। उनके प्रयास न केवल आत्मनिर्भरता और महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा देते हैं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था में महिलाओं की बढ़ती भूमिका को भी रेखांकित करते हैं।
लक्ष्मी बाई की कहानी उन महिलाओं के लिए प्रेरणादायक उदाहरण है, जो सीमित संसाधनों के बावजूद अपनी मेहनत, सीखने की इच्छा और नए अवसरों को अपनाकर सफल व्यवसाय खड़ा करना चाहती हैं।

