पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने सीलबंद पैकिंग में मिले मिसब्रांडेड कीटनाशक मामले में विक्रेता के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही रद्द की।
पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने सीलबंद पैकिंग में मिले मिसब्रांडेड कीटनाशक के मामले में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कीटनाशक विक्रेता और उसके प्रोपराइटर के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब विक्रेता उत्पाद का निर्माता या आयातक नहीं था, तो संबंधित परिस्थितियों में उसे कीटनाशक अधिनियम, 1968 की धारा 30(3) के तहत कानूनी संरक्षण मिल सकता है।
न्यायमूर्ति जसजीत सिंह बेदी ने 6 अक्टूबर 2026 को दिए फैसले में शिकायत, समन आदेश और उनसे संबंधित कार्यवाही को निरस्त कर दिया। यह निर्णय कृषि आदान विक्रेताओं के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि इसमें उत्पाद की गुणवत्ता से जुड़ी जिम्मेदारी तय करते समय विक्रेता की भूमिका और उपलब्ध कानूनी संरक्षण पर विचार किया गया।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला पंजाब के मलेरकोटला स्थित मेसर्स सोही खेती सेवा केंद्र और उसके प्रोपराइटर सिकंदर सिंह से जुड़ा है। अक्टूबर 2017 में कीटनाशक निरीक्षक और कृषि उपनिरीक्षक ने दुकान का निरीक्षण किया था। इस दौरान वहां फोरेट 10% सीजी की पांच-पांच किलोग्राम वाली 40 पैकिंग मिली थीं।
रिकॉर्ड के अनुसार, संबंधित कीटनाशक का निर्माण उत्तर प्रदेश के सिकंदराबाद स्थित मेसर्स एस.डी. एग्रो केमिकल्स लिमिटेड ने किया था। जांच के लिए नमूने लेने के बाद उत्पाद को मिसब्रांडेड पाया गया। इसके बाद कीटनाशक अधिनियम की धाराओं 29 और 33 के तहत शिकायत दर्ज की गई और विक्रेता समेत संबंधित पक्षों के खिलाफ कानूनी प्रक्रिया शुरू हुई।
सीलबंद पैकिंग को लेकर हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि जांच के लिए नमूने मूल सीलबंद पैकिंग से लिए गए थे। उपलब्ध रिकॉर्ड में ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिला, जिससे यह साबित हो कि विक्रेता ने पैकिंग के साथ छेड़छाड़ की थी या उसके पास कीटनाशक का भंडारण निर्धारित नियमों के विपरीत किया गया था।
अदालत ने संबंधित न्यायिक फैसलों और मामले के तथ्यों पर विचार करते हुए विक्रेता की भूमिका को महत्वपूर्ण माना। केवल किसी उत्पाद की बिक्री करने के आधार पर विक्रेता को उसकी गुणवत्ता या लेबलिंग में पाई गई गड़बड़ी के लिए स्वतः जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता, खासकर जब निर्माण प्रक्रिया और उत्पाद की गुणवत्ता पर उसका नियंत्रण नहीं था।
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कीटनाशक अधिनियम की धारा 30(3) में क्या है प्रावधान?
हाईकोर्ट ने कीटनाशक अधिनियम, 1968 की धारा 30(3) के तहत मिलने वाले वैधानिक बचाव पर भी विचार किया। इस प्रावधान के अंतर्गत निर्धारित शर्तें पूरी होने पर संबंधित व्यक्ति अपने बचाव में यह साबित कर सकता है कि उसने उत्पाद अधिकृत स्रोत से खरीदा था और उचित सावधानी बरतने के बावजूद उसे कथित गड़बड़ी की जानकारी नहीं थी।
इसके साथ ही, उत्पाद उसके कब्जे में रहने के दौरान उसकी स्थिति और भंडारण से जुड़े तथ्यों का भी महत्व होता है। ऐसे मामलों में कानूनी राहत उपलब्ध साक्ष्यों और संबंधित प्रावधान की शर्तों के आधार पर तय की जाती है।
इस मामले में सीलबंद पैकिंग, छेड़छाड़ के प्रमाण का अभाव और विक्रेता की भूमिका जैसे पहलुओं को ध्यान में रखते हुए अदालत ने उसके खिलाफ चल रही कार्यवाही रद्द कर दी।
शिकायत और समन आदेश भी किए गए निरस्त
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में 4 अक्टूबर 2017 की शिकायत, 11 अक्टूबर 2017 के समन आदेश और उनसे जुड़ी आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया। अदालत के निर्णय से संबंधित विक्रेता और उसके प्रोपराइटर को इस मामले में राहत मिली।
यह फैसला इस बात को रेखांकित करता है कि कीटनाशक से जुड़े मामलों में जिम्मेदारी निर्धारित करते समय केवल उत्पाद के अमानक पाए जाने को ही नहीं, बल्कि विक्रेता की वास्तविक भूमिका, पैकिंग की स्थिति और कानून के तहत उपलब्ध बचाव को भी देखना आवश्यक है।
कृषि आदान विक्रेताओं के लिए क्यों महत्वपूर्ण है फैसला?
बीज, उर्वरक और कीटनाशक बेचने वाले कारोबारियों के लिए यह निर्णय कानूनी दृष्टि से महत्वपूर्ण है। यह स्पष्ट करता है कि सीलबंद पैकिंग में मिले अमानक उत्पाद के मामले में विक्रेता की जिम्मेदारी तय करने के लिए संबंधित तथ्यों और कानूनी शर्तों का मूल्यांकन जरूरी है।
हालांकि, इस फैसले का अर्थ यह नहीं है कि सीलबंद पैकिंग में बेचे गए प्रत्येक अमानक कीटनाशक के मामले में विक्रेता को स्वतः दोषमुक्त कर दिया जाएगा। उत्पाद की खरीद का स्रोत, भंडारण की स्थिति, उचित सावधानी और उपलब्ध साक्ष्य जैसे पहलू प्रत्येक मामले में महत्वपूर्ण रहेंगे।

