पराली प्रबंधन: पराली जलाने पर रोक के लिए केंद्र सख्त, राज्यों को मशीनों का 100% उपयोग, जमीनी निगरानी बढ़ाने और किसानों को सस्ते विकल्प देने के निर्देश।
पराली प्रबंधन: धान की कटाई के दौरान पराली जलाने की घटनाओं पर नियंत्रण और फसल अवशेषों के बेहतर प्रबंधन के लिए केंद्र सरकार ने प्रयास तेज कर दिए हैं। नई दिल्ली के कृषि भवन में आयोजित उच्चस्तरीय अंतर-मंत्रालयी बैठक में राज्यों को पराली प्रबंधन के लिए उपलब्ध मशीनों का शत-प्रतिशत उपयोग सुनिश्चित करने, किसानों को किफायती विकल्प देने और निगरानी व्यवस्था मजबूत करने के निर्देश दिए गए।
बैठक की सह-अध्यक्षता केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण तथा ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान और केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने की। इसमें केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री भागीरथ चौधरी, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और दिल्ली-एनसीआर से जुड़े प्रतिनिधियों सहित केंद्र और राज्य सरकारों के वरिष्ठ अधिकारी शामिल हुए।
बैठक में इस बात पर जोर दिया गया कि पराली जलाने की समस्या का समाधान केवल प्रतिबंधों से नहीं होगा। इसके लिए किसानों को व्यावहारिक विकल्प उपलब्ध कराने, कृषि मशीनों की पहुंच बढ़ाने और जिला स्तर पर जवाबदेही तय करने की जरूरत है।
पराली प्रबंधन के लिए जिला स्तर पर बढ़ेगी निगरानी
शिवराज सिंह चौहान और भूपेंद्र यादव ने कहा कि धान की कटाई और रबी फसलों की बुवाई के बीच समय काफी सीमित है। इसलिए पराली जलाने की घटनाओं को रोकने के लिए प्रशासन को तेजी से कार्रवाई करनी होगी।
अधिकारियों को जिला स्तर पर समीक्षा बैठकें आयोजित करने, प्रभावित गांवों की पहचान करने और खेतों में नियमित निगरानी बढ़ाने के निर्देश दिए गए। साथ ही, किसानों को पराली प्रबंधन में आने वाली व्यावहारिक समस्याओं को समझकर उनका समाधान निकालने पर जोर दिया गया।
केंद्र सरकार का मानना है कि समय पर मशीनें उपलब्ध कराने और फसल अवशेषों के उपयोग के विकल्प बढ़ाने से किसानों को पराली जलाने से बचने में मदद मिल सकती है।
पराली से अतिरिक्त कमाई के अवसर तलाशने पर जोर
केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि किसानों को केवल पराली जलाने से रोकना पर्याप्त नहीं है। उन्हें ऐसे विकल्प भी मिलने चाहिए, जिनसे फसल अवशेषों का उपयोग करना आसान और आर्थिक रूप से लाभकारी हो।
पराली जलाने से वायु प्रदूषण बढ़ने के साथ मिट्टी में मौजूद उपयोगी जीवों और पोषक तत्वों को नुकसान पहुंच सकता है। इसके विकल्प के रूप में फसल अवशेषों को खेत में मिलाकर जैविक पदार्थ बढ़ाने या उन्हें अन्य उपयोगों के लिए एकत्र करने पर जोर दिया गया।
पराली का इस्तेमाल बायो-सीएनजी, बायो-इथेनॉल, बिजली उत्पादन और पशु चारे के लिए किया जा सकता है। इससे फसल अवशेषों का बेहतर उपयोग होने के साथ किसानों के लिए अतिरिक्त आय की संभावनाएं भी बन सकती हैं।
बैठक में पर्यावरण अनुकूल खेती और कार्बन क्रेडिट जैसे संभावित आर्थिक लाभों से किसानों को जोड़ने पर भी चर्चा हुई।
मध्य प्रदेश और राजस्थान में बढ़ती घटनाओं पर चिंता
बैठक में प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, 15 सितंबर से 12 अक्टूबर के बीच पिछले साल की समान अवधि की तुलना में हरियाणा में पराली जलाने की घटनाओं में 53.3 प्रतिशत और उत्तर प्रदेश में लगभग 32 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई। पंजाब में भी घटनाओं में गिरावट की जानकारी दी गई।
इसके विपरीत मध्य प्रदेश और राजस्थान में पराली जलाने की घटनाओं में बढ़ोतरी पर चिंता जताई गई। शिवराज सिंह चौहान ने इन राज्यों को अधिक प्रभावित जिलों और गांवों की पहचान कर विशेष कार्ययोजना लागू करने को कहा।
उन्होंने स्पष्ट किया कि जिन राज्यों में घटनाएं कम हुई हैं, उन्हें भी निगरानी में ढिलाई नहीं बरतनी चाहिए। धान की कटाई का काम जारी रहने के कारण आने वाले दिनों में भी सतर्कता बनाए रखना जरूरी है।
3.54 लाख से अधिक मशीनों का पूरा इस्तेमाल करने के निर्देश
केंद्र सरकार के अनुसार, राज्यों को अब तक 3.54 लाख से अधिक फसल अवशेष प्रबंधन मशीनें उपलब्ध कराई जा चुकी हैं। वित्त वर्ष 2026-27 में 26,109 अतिरिक्त मशीनें भी दी गई हैं।
शिवराज सिंह चौहान ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि नई मशीनों की उपलब्धता के साथ पुरानी और खराब पड़ी मशीनों की मरम्मत भी प्राथमिकता से कराई जाए। उनका जोर इस बात पर रहा कि सरकारी संसाधनों का वास्तविक इस्तेमाल खेतों में दिखाई देना चाहिए।
कस्टम हायरिंग सेंटर (CHC) को सक्रिय बनाने और छोटे व सीमांत किसानों को रियायती दरों पर मशीनें उपलब्ध कराने की जरूरत भी बताई गई। इससे उन किसानों को मदद मिल सकती है, जो महंगे कृषि उपकरण खरीदने में सक्षम नहीं हैं।
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पराली प्रबंधन योजना के तहत 4,266 करोड़ रुपये से अधिक जारी
बैठक में साझा जानकारी के मुताबिक, केंद्र सरकार ने फसल अवशेष प्रबंधन (CRM) योजना के तहत वर्ष 2018-19 से 2025-26 तक राज्यों को कुल 4,266.47 करोड़ रुपये जारी किए हैं।
राज्यवार आवंटन इस प्रकार बताया गया:
- पंजाब: 2,056.50 करोड़ रुपये
- हरियाणा: 1,171.71 करोड़ रुपये
- उत्तर प्रदेश: 868.67 करोड़ रुपये
- मध्य प्रदेश: 59 करोड़ रुपये
वित्त वर्ष 2026-27 के लिए 592.57 करोड़ रुपये का आवंटन निर्धारित किया गया है, जिसमें से 430.87 करोड़ रुपये जारी किए जा चुके हैं।
योजना के तहत उपलब्ध धनराशि के इस्तेमाल की गति पर चिंता जताते हुए कृषि मंत्री ने कहा कि किसानों को जरूरत के समय संसाधन उपलब्ध कराना जरूरी है। उन्होंने पंजाब सरकार से पहले जारी धनराशि का उपयोगिता प्रमाण पत्र (UC) जल्द जमा कराने का आग्रह किया, ताकि आगे की वित्तीय प्रक्रिया में देरी न हो।
पराली से पशु चारा और बायो-फ्यूल बनाने को मिलेगा बढ़ावा
बैठक में पराली के वैकल्पिक उपयोग को बढ़ाने के लिए कई उपायों पर चर्चा हुई। शिवराज सिंह चौहान ने सूखा प्रभावित इलाकों में फसल अवशेषों को सुरक्षित तरीके से एकत्र करके पशु चारे के रूप में इस्तेमाल करने की व्यवस्था विकसित करने के निर्देश दिए।
इसके अलावा थर्मल पावर प्लांटों में पराली से बने पेलेट्स के उपयोग, कंप्रेस्ड बायोगैस (CBG) और दूसरी पीढ़ी के बायो-इथेनॉल संयंत्रों तक फसल अवशेष पहुंचाने के लिए आपूर्ति व्यवस्था मजबूत करने पर जोर दिया गया।
राज्यों से यह भी कहा गया कि पराली की आपूर्ति से संबंधित स्वीकृत परियोजनाओं को समय पर शुरू कराया जाए। इससे फसल अवशेषों की मांग बढ़ सकती है और किसानों को उन्हें बेचने के अवसर मिल सकते हैं।
कम अवधि में पकने वाली धान की किस्मों को प्रोत्साहन
धान की कटाई और रबी फसलों की बुवाई के बीच पर्याप्त समय उपलब्ध कराने के लिए कम अवधि में तैयार होने वाली धान की किस्मों को बढ़ावा देने पर भी चर्चा की गई।
शिवराज सिंह चौहान ने पूसा-44 जैसी अधिक समय लेने वाली किस्मों के स्थान पर पूसा 2090 और PR126 जैसी अपेक्षाकृत कम अवधि में पकने वाली किस्मों के इस्तेमाल को प्रोत्साहित करने की बात कही।
समय पर धान की कटाई होने से किसानों को खेत तैयार करने और अगली फसल की बुवाई के लिए अधिक समय मिल सकता है। इससे पराली प्रबंधन की समस्या को कम करने में भी मदद मिलने की संभावना है।
केंद्र ने राज्यों को हरसंभव मदद का भरोसा दिया
कृषि मंत्री ने कहा कि पराली प्रबंधन योजनाओं को जमीन पर प्रभावी तरीके से लागू करने की प्रमुख जिम्मेदारी राज्य सरकारों और जिला प्रशासन की है। हालांकि, केंद्र सरकार तकनीकी, प्रशासनिक और वित्तीय सहायता उपलब्ध कराने के लिए प्रतिबद्ध है।
उन्होंने संबंधित मंत्रालयों, कृषि विज्ञान केंद्रों (KVK) और जिला प्रशासन से पराली प्रबंधन को साझा राष्ट्रीय प्राथमिकता के रूप में लेने की अपील की। इसका उद्देश्य प्रदूषण कम करने के साथ किसानों की आय बढ़ाने वाले विकल्पों को भी प्रोत्साहित करना है।
दोपहर 3 बजे के बाद भी होगी निगरानी
केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने कहा कि पराली जलाने की रोकथाम के लिए उपग्रह से मिलने वाले आंकड़ों के साथ जमीनी निगरानी भी जरूरी है।
उन्होंने पंजाब के संगरूर, तरनतारन, अमृतसर, पटियाला और गुरदासपुर तथा हरियाणा के कैथल, करनाल, कुरुक्षेत्र, अंबाला और फतेहाबाद जैसे जिलों में विशेष निगरानी पर जोर दिया।
अधिकारियों को फसल कटाई के रुझानों का आकलन करने और संभावित घटनाओं की पहले से पहचान करने के निर्देश दिए गए। पराली जलाने से संबंधित आंकड़ों को वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के साथ बेहतर ढंग से जोड़ने की जरूरत भी बताई गई।
भूपेंद्र यादव ने कहा कि मौसम की परिस्थितियों और फसल कटाई के संभावित समय पर नजर रखने से प्रदूषण नियंत्रण के लिए समय रहते कदम उठाए जा सकते हैं।
उन्होंने विशेष रूप से दोपहर 3 बजे के बाद उपग्रह निगरानी में आने वाले अंतराल के दौरान जमीनी गश्त और फ्लाइंग स्क्वॉड को सक्रिय रखने पर जोर दिया। जिला कलेक्टरों को मौके पर स्थिति का आकलन करने और नियमों के पालन की निगरानी करने के निर्देश भी दिए गए।
पराली जलाने पर रोक के लिए जरूरी होंगे ठोस विकल्प
केंद्र सरकार की इस बैठक में मशीनों के उपयोग, वित्तीय संसाधनों के बेहतर प्रबंधन, जमीनी निगरानी और पराली के वैकल्पिक इस्तेमाल को प्रमुख प्राथमिकताओं के रूप में सामने रखा गया।
पराली जलाने की घटनाओं में स्थायी कमी लाने के लिए किसानों को समय पर मशीनें उपलब्ध कराना, फसल अवशेष खरीदने वाले उद्योगों से जोड़ना और जिला स्तर पर प्रभावी कार्रवाई करना महत्वपूर्ण होगा।

