श्योपुर के माधो का डेरा गांव की 42 महिलाएं 150 बीघा में मिर्ची उगा रही हैं। NRLM की सहायता, 18 लाख की सीसीएल राशि और ड्रिप सिंचाई से खेती को मिला बढ़ावा।
मध्य प्रदेश के श्योपुर जिले में स्वसहायता समूहों से जुड़ी महिलाएं पारंपरिक खेती के बजाय मिर्ची उत्पादन को अपनाकर अपनी आजीविका मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रही हैं। माधो का डेरा गांव की 42 महिलाएं लगभग 150 बीघा जमीन पर मिर्ची की खेती कर रही हैं। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (NRLM) के सहयोग से शुरू हुई इस पहल के तहत खेतों में फसल तैयार हो चुकी है और मिर्ची की तुड़ाई भी शुरू हो गई है। उत्पाद की पहली खेप जयपुर और दिल्ली की मंडियों में भेजी गई है।
चार स्वसहायता समूहों की 42 महिलाएं कर रहीं मिर्ची की खेती
श्योपुर जिला मुख्यालय से करीब 35 किलोमीटर दूर स्थित माधो का डेरा गांव में महिलाओं ने खेती के पारंपरिक तरीकों से आगे बढ़ते हुए नकदी फसल के रूप में मिर्ची का चयन किया है। इस पहल में गुरुनानक, डॉ. अंबेडकर, माता गुलाब देवी और गुरुनारायण स्वसहायता समूहों से जुड़ी 42 महिलाएं शामिल हैं।
इन महिलाओं के परिवारों के पास सीमित कृषि भूमि है। पारंपरिक फसलों से होने वाली कमाई परिवार की जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं हो पाती थी। इसी समस्या को ध्यान में रखते हुए राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के माध्यम से महिलाओं को सब्जी उत्पादन और अधिक आय की संभावना वाली फसलों की खेती के लिए प्रोत्साहित किया गया।
कलेक्टर शीला दाहिमा के मार्गदर्शन और जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी कार्तिकेय जायसवाल के निर्देशन में संचालित इस पहल का उद्देश्य ग्रामीण महिलाओं के लिए रोजगार और आमदनी के नए अवसर तैयार करना है।
18 लाख रुपये की सीसीएल राशि से जुटाए खेती के संसाधन
मिर्ची की खेती शुरू करने के लिए चारों स्वसहायता समूहों को लगभग 18 लाख रुपये की सीसीएल राशि उपलब्ध कराई गई। इस आर्थिक सहायता से महिलाओं ने उन्नत किस्म के बीज, खाद और खेती के लिए जरूरी अन्य संसाधनों की व्यवस्था की।
राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तकनीकी सहयोग से महिलाओं ने वैज्ञानिक पद्धतियों को अपनाते हुए अपने खेतों में मिर्ची की बुवाई की। अलग-अलग महिलाओं ने दो से छह बीघा तक जमीन पर खेती की है।
सिंचाई की बेहतर व्यवस्था के लिए उद्यानिकी विभाग की योजना के तहत अनुदान लेकर ड्रिप सिंचाई प्रणाली भी स्थापित की गई। इससे फसलों तक जरूरत के अनुसार पानी पहुंचाने में मदद मिल रही है। आर्थिक सहायता, तकनीकी मार्गदर्शन और आधुनिक सिंचाई व्यवस्था ने महिलाओं को व्यवस्थित तरीके से मिर्ची उत्पादन करने का अवसर दिया है।
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जयपुर और दिल्ली की मंडियों में भेजी गई मिर्ची
मिर्ची की फसल तैयार होने के बाद अब खेतों में तुड़ाई का काम शुरू हो चुका है। उत्पाद की पहली खेप जयपुर और दिल्ली की मंडियों में भेजी गई है। इससे महिला किसानों को स्थानीय बाजार से आगे दूसरे बड़े बाजारों तक अपनी उपज पहुंचाने का अवसर मिला है।
मिर्ची उत्पादक किसान सीमा बाई ने बताया कि उन्होंने पांच बीघा जमीन में मिर्ची लगाई है। उनके खेत में फसल की तुड़ाई शुरू हो चुकी है और उपज जयपुर मंडी भेजी गई है। उनके अनुसार, फसल की तुड़ाई अप्रैल तक चलने की उम्मीद है और पूरे सीजन में करीब 12 बार तुड़ाई की जा सकती है।
सीमा बाई का अनुमान है कि खेती की लागत निकालने के बाद एक बीघा से करीब दो लाख रुपये की आमदनी हो सकती है। इस हिसाब से पांच बीघा में मिर्ची उत्पादन से लगभग 10 लाख रुपये की आमदनी होने की उम्मीद है। हालांकि, वास्तविक लाभ उत्पादन, बाजार भाव और खेती की लागत पर निर्भर करेगा।
नकदी फसलों से महिलाओं की आर्थिक स्थिति मजबूत करने की पहल
राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के नोडल अधिकारी अनुज विजयवर्गीय के अनुसार, कृषि सखियों के माध्यम से छोटी जोत वाले किसानों को पारंपरिक फसलों के साथ नकदी फसलों और सब्जियों की खेती अपनाने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। माधो का डेरा गांव में इसी प्रयास के तहत लगभग 150 बीघा क्षेत्र में मिर्ची उत्पादन का क्लस्टर विकसित किया गया है।
एनआरएलएम के जिला परियोजना प्रबंधक सोहनकृष्ण मुदगल ने बताया कि महिलाओं को खेती के लिए जरूरी संसाधन उपलब्ध कराने के साथ उनकी आय बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है। उद्यानिकी और मसाला फसलों के उत्पादन को बढ़ावा देकर ग्रामीण क्षेत्रों में स्वरोजगार के अवसर विकसित करने का प्रयास किया जा रहा है।
ग्रामीण महिलाओं के लिए बनी प्रेरणा
माधो का डेरा गांव की महिलाओं का यह प्रयास बताता है कि स्वसहायता समूहों, सरकारी योजनाओं, तकनीकी मार्गदर्शन और बेहतर बाजार संपर्क के माध्यम से खेती को आय का मजबूत साधन बनाया जा सकता है। मिर्ची उत्पादन के जरिए महिलाएं अपनी कृषि गतिविधियों का विस्तार कर रही हैं और बड़े बाजारों तक पहुंच बनाने की दिशा में कदम बढ़ा रही हैं।

