यूपी चुनाव 2027 से पहले मायावती की पार्टी के सामने सियासी चुनौती, विधानसभा में शून्य प्रतिनिधित्व के बाद राष्ट्रीय दर्जे पर भी सवाल।
बहुजन समाज पार्टी (BSP) की उत्तर प्रदेश की राजनीति में स्थिति पिछले कुछ वर्षों में लगातार बदली है। 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी के सामने संगठन और चुनावी आधार को मजबूत करने की चुनौती है। अगस्त 2026 में रसड़ा से BSP विधायक उमाशंकर सिंह के निधन के बाद उत्तर प्रदेश विधानसभा में पार्टी का कोई विधायक नहीं रह गया है।
राष्ट्रीय स्तर पर भी BSP की चुनावी मौजूदगी पहले के मुकाबले काफी कम हुई है। 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी एक भी सीट नहीं जीत सकी और उसका वोट शेयर 2.06 फीसदी रहा।
विधानसभा में BSP का प्रतिनिधित्व हुआ खत्म
बलिया की रसड़ा विधानसभा सीट से BSP विधायक उमाशंकर सिंह का 5 अगस्त 2026 को निधन हो गया। वह 403 सदस्यीय उत्तर प्रदेश विधानसभा में BSP के एकमात्र विधायक थे। उनके निधन के बाद सदन में पार्टी का प्रतिनिधित्व शून्य हो गया।
उमाशंकर सिंह ने 2022 के विधानसभा चुनाव में BSP के टिकट पर रसड़ा सीट जीती थी। उस चुनाव में वह पार्टी के इकलौते विजेता उम्मीदवार रहे थे।
कभी यूपी में था BSP का बहुमत
BSP के मौजूदा प्रदर्शन की तुलना उसके पुराने चुनावी दौर से करें तो तस्वीर काफी अलग नजर आती है। 2007 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में BSP ने 403 में से 206 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत हासिल किया था। चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक उस चुनाव में पार्टी को 30.43 फीसदी वोट मिले थे।
इसके बाद 2012 के विधानसभा चुनाव में BSP की सीटों की संख्या घटकर 80 रह गई, जबकि समाजवादी पार्टी ने 224 सीटों के साथ सरकार बनाई।
लोकसभा चुनावों में भी बदला प्रदर्शन
लोकसभा चुनावों में भी BSP का प्रदर्शन पिछले डेढ़ दशक में काफी बदला है। 2009 में पार्टी ने 21 सीटें जीती थीं और उसका वोट शेयर 6.17 फीसदी था। 2014 में BSP कोई सीट नहीं जीत सकी, हालांकि उसका वोट शेयर 4.14 फीसदी रहा।
2019 में समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन में BSP ने 10 लोकसभा सीटों पर जीत दर्ज की। इसके बाद 2024 में पार्टी अकेले चुनाव मैदान में उतरी, लेकिन एक भी सीट नहीं जीत सकी और उसका वोट शेयर 2.06 फीसदी रह गया।
2027 से पहले दलित वोट बैंक अहम मुद्दा
उत्तर प्रदेश की राजनीति में BSP की पहचान लंबे समय से दलित राजनीति और खासतौर पर जाटव वोट बैंक के साथ जुड़ी रही है। ऐसे में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी के लिए अपने पारंपरिक समर्थक आधार को बनाए रखना एक महत्वपूर्ण राजनीतिक मुद्दा होगा।
दूसरी ओर, राज्य की अन्य प्रमुख राजनीतिक पार्टियां भी दलित मतदाताओं के बीच अपना समर्थन बढ़ाने की कोशिश कर रही हैं। इसके चलते BSP के सामने अपने संगठन को जमीनी स्तर पर सक्रिय रखने और मतदाताओं तक अपनी राजनीतिक अपील पहुंचाने की चुनौती बनी हुई है।
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राष्ट्रीय पार्टी के दर्जे पर क्यों हो रही चर्चा?
BSP को चुनाव आयोग की सूची में राष्ट्रीय पार्टी के तौर पर मान्यता प्राप्त है। अगस्त 2025 में चुनाव आयोग की ओर से जारी दस्तावेज में BSP को मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय पार्टियों में शामिल किया गया था।
राष्ट्रीय पार्टी की मान्यता के लिए चुनाव आयोग के निर्धारित मानदंडों में अलग-अलग शर्तें शामिल हैं। इनमें लोकसभा सीटों की संख्या, विभिन्न राज्यों में वोट प्रतिशत और राज्यों में पार्टी की मान्यता जैसे आधार शामिल हैं।
इसलिए BSP के हालिया चुनावी प्रदर्शन के बाद राष्ट्रीय पार्टी के दर्जे को लेकर राजनीतिक चर्चा जरूर बढ़ी है, लेकिन मौजूदा स्थिति को सीधे तौर पर “राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा खत्म” कहना सही नहीं होगा। इसकी स्थिति चुनाव आयोग के लागू नियमों और भविष्य के चुनावी प्रदर्शन के आधार पर तय होगी।
मायावती के सामने 2027 की बड़ी चुनौती
2027 का उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव BSP के लिए महत्वपूर्ण होगा। पार्टी को एक तरफ विधानसभा में अपनी मौजूदगी दोबारा स्थापित करनी होगी, वहीं दूसरी तरफ लोकसभा में मिली शून्य सीटों के बाद राष्ट्रीय राजनीति में अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने की चुनौती भी है।
मायावती के नेतृत्व वाली BSP की आगे की रणनीति, उम्मीदवार चयन, संगठनात्मक सक्रियता और वोट बैंक को लेकर उसकी चुनावी रणनीति आने वाले समय में अहम भूमिका निभा सकती है।
फिलहाल तथ्य यह है कि BSP के पास उत्तर प्रदेश विधानसभा में कोई विधायक नहीं है और 2024 लोकसभा चुनाव में भी पार्टी कोई सीट नहीं जीत सकी थी। ऐसे में 2027 का चुनाव पार्टी के लिए अपनी चुनावी ताकत को दोबारा स्थापित करने का महत्वपूर्ण अवसर होगा।

