उड़द-मूंग की फसल में फली छेदक, पीला मोजेक और जड़ सड़न से बचाव के उपाय जानें। TNAU की कृषि सलाह के अनुसार कीट प्रबंधन और फसल सुरक्षा के तरीके पढ़ें।
उड़द-मूंग की फसल करने वाले किसानों के लिए फली छेदक कीट, पीला मोजेक रोग और जड़ सड़न की समस्या चिंता का कारण बन सकती है। इनसे फसल की वृद्धि प्रभावित होने के साथ उत्पादन में भी कमी आ सकती है। तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय (TNAU) ने अक्टूबर माह की कीट एवं रोग प्रबंधन सलाह में इन समस्याओं से बचाव के लिए विभिन्न उपाय सुझाए हैं। किसानों को नियमित रूप से खेतों की निगरानी करने और रोग या कीट के शुरुआती लक्षण दिखाई देने पर उचित कदम उठाने की सलाह दी गई है।
उड़द में फली छेदक कीट से फसल को कैसे बचाएं?
उड़द की फसल में स्पॉटेड पॉड बोरर यानी फली छेदक कीट फलियों को नुकसान पहुंचाता है। यह कीट फलियों में छेद करके अंदर मौजूद दानों को खाता है। इसके कारण फलियों की गुणवत्ता खराब हो सकती है और पैदावार पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है।
तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय की सलाह के अनुसार, फली छेदक के प्रबंधन के लिए निम्न उपाय बताए गए हैं:
- जैविक नियंत्रण: बैसिलस थुरिंजिएन्सिस वरायटी कुर्स्टाकी (Bacillus thuringiensis var. kurstaki) का 500 से 625 मिलीलीटर प्रति हेक्टेयर की दर से उपयोग करने का सुझाव दिया गया है।
- कीटनाशक का विकल्प: थायोडिकार्ब 17 प्रतिशत WP का 625 ग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से उपयोग करने की सलाह दी गई है।
- लाइट ट्रैप: कीटों की निगरानी और नियंत्रण में मदद के लिए प्रति हेक्टेयर एक प्रकाश प्रपंच लगाने का सुझाव दिया गया है।
- बर्ड पर्च: खेत में प्रति हेक्टेयर 125 पक्षी बैठने के स्थान लगाने से कीट खाने वाले पक्षियों को आकर्षित करने में मदद मिल सकती है।
किसानों को किसी भी कीटनाशक का उपयोग करने से पहले संबंधित फसल और कीट के लिए उसके पंजीकरण, लेबल निर्देशों तथा अनुशंसित मात्रा की पुष्टि करनी चाहिए।
उड़द में पीला मोजेक रोग के लक्षण और बचाव
उड़द में पीला शिरा मोजेक (Yellow Vein Mosaic) एक महत्वपूर्ण विषाणुजनित रोग है। इसकी पहचान पत्तियों की नसों और उनके आसपास पीलेपन से की जा सकती है। रोग बढ़ने पर पौधों की सामान्य वृद्धि प्रभावित होती है और फलियों का उत्पादन घट सकता है।
यह रोग सफेद मक्खी जैसे वाहक कीटों से फैलता है। इसलिए इसके प्रबंधन में वाहक कीट की निगरानी और नियंत्रण महत्वपूर्ण है।
विश्वविद्यालय की सलाह में डाइमेथोएट 30 प्रतिशत EC की 500 मिलीलीटर प्रति हेक्टेयर या मिथाइल डेमेटॉन 25 प्रतिशत EC की 500 मिलीलीटर प्रति हेक्टेयर मात्रा का उल्लेख किया गया है। हालांकि, इन रसायनों के उपयोग से पहले वर्तमान पंजीकरण, फसल पर स्वीकृत उपयोग और स्थानीय कृषि विभाग की सलाह की पुष्टि करना आवश्यक है।
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मूंग की फसल में जड़ सड़न रोग का प्रबंधन
मूंग में जड़ सड़न की समस्या होने पर पौधों की जड़ें कमजोर हो सकती हैं। इससे पौधों का विकास रुकने लगता है और वे मुरझाने लगते हैं। रोग की पहचान के लिए पौधों की जड़ों और तने के निचले हिस्से की जांच करना जरूरी है।
TNAU की सलाह में कार्बेन्डाजिम 50 प्रतिशत WP को एक ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से तैयार करके जड़ों के आसपास मिट्टी में ड्रेंचिंग करने का उल्लेख किया गया है। इस उपाय को अपनाने से पहले यह सुनिश्चित करें कि संबंधित उत्पाद का उपयोग मूंग की फसल में इस रोग के लिए स्वीकृत है। रोग की सही पहचान के लिए कृषि विशेषज्ञ की मदद लेना भी उपयोगी रहेगा।
मूंग में पीला मोजेक रोग से बचाव के उपाय
मूंग की फसल में भी पीला मोजेक रोग सफेद मक्खी के माध्यम से फैल सकता है। इस रोग से प्रभावित पौधों की पत्तियों पर पीले धब्बे या पीली नसें दिखाई दे सकती हैं। गंभीर संक्रमण होने पर पौधों की वृद्धि और उत्पादन दोनों प्रभावित होते हैं।
रोकथाम के लिए कृषि विश्वविद्यालय की सलाह में ये उपाय शामिल हैं:
- बीज उपचार: थायामेथोक्साम 30 प्रतिशत FS से 10 मिलीलीटर प्रति किलोग्राम बीज की दर का उल्लेख किया गया है। बीज उपचार के लिए वर्तमान स्वीकृत निर्देशों की पुष्टि करें।
- जैविक उपाय: बैसिलस सबटिलिस (Bacillus subtilis) का 2.5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से मिट्टी में उपयोग करने का सुझाव दिया गया है।
- पीले चिपचिपे ट्रैप: सफेद मक्खी की निगरानी और संख्या घटाने के लिए प्रति हेक्टेयर 12 पीले स्टिकी ट्रैप लगाने की सलाह दी गई है।
- वाहक कीट प्रबंधन: विश्वविद्यालय की सलाह में एसिटामिप्रिड 20 प्रतिशत WP की 250 ग्राम प्रति हेक्टेयर मात्रा का उल्लेख है। इसका प्रयोग तभी करें, जब संबंधित फसल और कीट के लिए उत्पाद का उपयोग वर्तमान में स्वीकृत हो।
पीला मोजेक विषाणुजनित रोग होने के कारण संक्रमित पौधे का सीधा उपचार संभव नहीं होता। इसलिए सफेद मक्खी का प्रबंधन, नियमित निगरानी और रोग के प्रसार को रोकने वाले उपाय विशेष महत्व रखते हैं।
उड़द-मूंग की अच्छी पैदावार के लिए किसानों को इन बातों का रखना चाहिए ध्यान
फसल को कीटों और रोगों से बचाने के लिए समय-समय पर खेत का निरीक्षण करना चाहिए। पत्तियों पर पीलापन, फलियों में छेद, पौधों का मुरझाना या जड़ों में सड़न जैसे लक्षण दिखाई देने पर समस्या की सही पहचान कराएं।
किसानों को एक ही रासायनिक दवा का लगातार इस्तेमाल करने से बचना चाहिए। कीटों में प्रतिरोधक क्षमता विकसित होने का खतरा कम करने के लिए कृषि विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार समेकित कीट प्रबंधन अपनाना बेहतर है। इसमें जैविक नियंत्रण, खेत की निगरानी, उचित कृषि पद्धतियां और जरूरत पड़ने पर स्वीकृत कीटनाशकों का इस्तेमाल शामिल है।
छिड़काव करते समय सुरक्षात्मक उपकरणों का उपयोग करें और उत्पाद के लेबल पर दी गई प्रतीक्षा अवधि का पालन करें। इससे फसल की गुणवत्ता बनाए रखने और अनावश्यक रासायनिक उपयोग को कम करने में मदद मिल सकती है।

