ICAR प्राकृतिक खेती में MSc और PhD पाठ्यक्रम तैयार कर रहा है। जानें संभावित विषय, करियर विकल्प, पाठ्यक्रम निर्माण और प्रवेश से जुड़ी ताजा जानकारी।
प्राकृतिक खेती के क्षेत्र में करियर बनाने की इच्छा रखने वाले छात्रों के लिए आने वाले समय में उच्च शिक्षा के नए अवसर खुल सकते हैं। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) प्राकृतिक खेती पर अलग से मास्टर ऑफ साइंस (MSc) और पीएचडी पाठ्यक्रम शुरू करने की दिशा में काम कर रही है। इसके लिए परिषद ने कृषि शिक्षा, उद्योग और शोध क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों के साथ विचार-विमर्श कर सुझाव मांगे हैं। प्रस्तावित पाठ्यक्रम का उद्देश्य प्राकृतिक खेती के लिए प्रशिक्षित विशेषज्ञ तैयार करना और किसानों तक वैज्ञानिक जानकारी पहुंचाने की व्यवस्था मजबूत करना है।
इस संबंध में नई दिल्ली में आयोजित बैठक की अध्यक्षता कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग (DARE) के सचिव और ICAR के महानिदेशक डॉ. एम.एल. जाट ने की। उन्होंने कहा कि पाठ्यक्रम को वर्तमान कृषि जरूरतों के अनुरूप तैयार किया जाना चाहिए, ताकि इसका लाभ किसानों, कृषि उद्योग और समाज को मिल सके।
प्राकृतिक खेती के लिए तैयार होगा अलग MSc और PhD पाठ्यक्रम
ICAR के कृषि शिक्षा प्रभाग की ओर से आयोजित बैठक में प्रस्तावित उच्च शिक्षा कार्यक्रम की रूपरेखा पर चर्चा की गई। इसका मकसद प्राकृतिक खेती को केवल एक कृषि पद्धति के रूप में पढ़ाने के बजाय उससे जुड़े वैज्ञानिक, तकनीकी, आर्थिक और व्यावसायिक पहलुओं की विस्तृत जानकारी देना है।
डॉ. एम.एल. जाट ने सुझाव दिया कि पाठ्यक्रम में जैविक कृषि आदानों, मिट्टी की सेहत, प्रमाणन व्यवस्था, कृषि उत्पादों की मूल्य श्रृंखला, विपणन और डिजिटल तकनीकों को उचित स्थान दिया जाए।
उनके अनुसार, प्राकृतिक खेती से जुड़े पाठ्यक्रम को इस तरह विकसित करना जरूरी है कि छात्र पढ़ाई पूरी करने के बाद खेतों में काम करने के साथ-साथ शोध, कृषि परामर्श और कृषि व्यवसाय के क्षेत्र में भी अपनी भूमिका निभा सकें।
नई शिक्षा नीति के अनुरूप होगा पाठ्यक्रम
बैठक में ICAR के उप-महानिदेशक (कृषि शिक्षा) डॉ. यशपाल सिंह मलिक ने कहा कि प्रस्तावित पाठ्यक्रम को राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अनुरूप विकसित किया जाना चाहिए।
इसके तहत पढ़ाई को बहु-विषयक, कौशल आधारित और उद्योग की जरूरतों से जुड़ा बनाने पर जोर दिया गया। इससे छात्रों को सैद्धांतिक ज्ञान के साथ व्यावहारिक प्रशिक्षण भी मिल सकेगा।
प्राकृतिक खेती से जुड़े पाठ्यक्रम में खेतों की वास्तविक परिस्थितियों, उत्पादन तकनीकों, कृषि संसाधनों के प्रबंधन और बाजार की जरूरतों को समझने के अवसर दिए जाने की परिकल्पना है। इससे विद्यार्थियों को कृषि क्षेत्र में रोजगार और स्वरोजगार के संभावित विकल्पों के लिए तैयार करने में मदद मिल सकती है।
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जैविक और प्राकृतिक खेती के बीच का अंतर भी समझेंगे छात्र
प्रस्तावित MSc और PhD पाठ्यक्रम के निर्माण की जिम्मेदारी गुजरात प्राकृतिक कृषि विज्ञान विश्वविद्यालय को दी गई है। विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. सी.के. टिंबाडिया पाठ्यक्रम निर्माण समिति की अध्यक्षता कर रहे हैं। बैठक में सहायक महानिदेशक डॉ. ए.एस. यादव ने भी प्रस्तावित पाठ्यक्रमों की रूपरेखा प्रस्तुत की।
चर्चा के दौरान डॉ. जाट ने प्राकृतिक खेती, जैविक खेती और रसायन-मुक्त खेती की अन्य विधियों के बीच अंतर को स्पष्ट रूप से शामिल करने पर जोर दिया।
इसका उद्देश्य छात्रों को विभिन्न कृषि पद्धतियों के सिद्धांतों, तरीकों और उपयोग की परिस्थितियों की बेहतर समझ देना है। इससे वे किसानों को उनकी जमीन, स्थानीय जलवायु और उपलब्ध संसाधनों के अनुसार उपयुक्त कृषि पद्धतियों के बारे में मार्गदर्शन दे सकेंगे।
प्रमाणन, मार्केटिंग और कृषि उद्यमिता पर भी रहेगा फोकस
प्राकृतिक खेती में उत्पादन के साथ कृषि उत्पादों की गुणवत्ता, प्रमाणन और बाजार तक पहुंच भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसी वजह से प्रस्तावित पाठ्यक्रम में कृषि उद्यमिता और विपणन को भी शामिल करने का सुझाव दिया गया है।
विद्यार्थियों को कृषि उत्पादों की मूल्य संवर्धन प्रक्रिया, प्रमाणन एजेंसियों की भूमिका और किसान उत्पादक संगठनों (FPOs) के कामकाज से संबंधित जानकारी देने पर विचार किया जा रहा है।
इस तरह की शिक्षा से छात्रों के लिए प्राकृतिक खेती सलाहकार, कृषि प्रमाणन विशेषज्ञ, मूल्य संवर्धन सलाहकार और शोधकर्ता जैसे करियर विकल्प विकसित हो सकते हैं। हालांकि, इन क्षेत्रों में वास्तविक अवसर संबंधित योग्यता, अनुभव और रोजगार की उपलब्धता पर निर्भर करेंगे।
विशेषज्ञों के सुझावों के बाद अंतिम रूप दिया जाएगा पाठ्यक्रम
ICAR के अनुसार, बैठक में प्राप्त सुझावों का मूल्यांकन करने के बाद प्रस्तावित पाठ्यक्रम को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाएगी। बैठक में कृषि उद्योग और शिक्षा जगत से जुड़े विशेषज्ञों ने भी अपने विचार साझा किए।
कार्यक्रम के समापन पर ICAR के सहायक महानिदेशक (मानव संसाधन प्रबंधन) डॉ. एस.के. शर्मा ने धन्यवाद प्रस्ताव प्रस्तुत किया।
फिलहाल, MSc और PhD पाठ्यक्रमों के शुरू होने की निश्चित तारीख, प्रवेश प्रक्रिया और उन कृषि विश्वविद्यालयों की सूची सार्वजनिक नहीं की गई है, जहां इनकी पढ़ाई शुरू होगी। इसलिए इच्छुक विद्यार्थियों को आधिकारिक घोषणा और संबंधित विश्वविद्यालयों की अधिसूचनाओं का इंतजार करना होगा।
प्राकृतिक खेती के लिए प्रशिक्षित विशेषज्ञों की जरूरत
देश के विभिन्न राज्यों में प्राकृतिक खेती को प्रोत्साहित करने के प्रयास किए जा रहे हैं। ऐसे में किसानों को सही तकनीकी मार्गदर्शन देने, खेती से जुड़े प्रयोगों का मूल्यांकन करने और प्राकृतिक कृषि उत्पादों की बाजार व्यवस्था विकसित करने के लिए प्रशिक्षित लोगों की जरूरत बढ़ सकती है।
प्रस्तावित उच्च शिक्षा कार्यक्रम इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है। इसके माध्यम से कृषि स्नातकों को प्राकृतिक खेती से संबंधित वैज्ञानिक शोध और व्यावहारिक कार्यों में विशेषज्ञता हासिल करने का अवसर मिल सकता है।
गुजरात प्राकृतिक कृषि विज्ञान विश्वविद्यालय को पाठ्यक्रम तैयार करने की जिम्मेदारी दिए जाने के बाद भविष्य में अन्य कृषि विश्वविद्यालयों में भी ऐसे कार्यक्रम शुरू करने की संभावना पर चर्चा हो सकती है। हालांकि, दूसरे विश्वविद्यालयों में पाठ्यक्रम लागू करने के संबंध में अभी औपचारिक घोषणा नहीं हुई है।
यदि प्रस्तावित MSc और PhD कार्यक्रम लागू होते हैं, तो इससे प्राकृतिक खेती में उच्च शिक्षा, शोध और विशेषज्ञ प्रशिक्षण के लिए एक व्यवस्थित शैक्षणिक ढांचा विकसित करने में मदद मिल सकती है।

