गोरखपुर के इमरान खान ने नशे की लत से छुटकारा पाकर नई जिंदगी शुरू की। जानें कैसे पुनर्वास और इलाज से वह ₹40,000 महीना कमा रहे हैं।
नशे की लत किसी भी व्यक्ति की जिंदगी, सेहत, परिवार और रोजगार पर गंभीर असर डाल सकती है। लेकिन सही समय पर इलाज, काउंसलिंग और परिवार के सहयोग से जिंदगी को दोबारा बेहतर बनाया जा सकता है। उत्तर प्रदेश के गोरखपुर के रहने वाले इमरान खान (बदला हुआ नाम) की कहानी इसका उदाहरण है। कभी नशे की गिरफ्त में रहने वाले इमरान आज नशामुक्त जीवन जी रहे हैं और एसी मैकेनिक के रूप में स्वरोजगार करके हर महीने करीब 30,000 से 40,000 रुपये तक कमा रहे हैं।
इमरान की यह यात्रा बताती है कि नशे की समस्या से जूझ रहे लोगों को सही उपचार और पुनर्वास की सुविधाएं मिलें, तो वे अपने जीवन को नई दिशा दे सकते हैं।
12 साल की उम्र में शुरू हुई नशे की आदत
गोरखपुर के इमरान खान की परेशानी बचपन में शुरू हुई थी। महज 12 साल की उम्र में दोस्तों के दबाव में उन्होंने सिगरेट पीना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे उनकी यह आदत बढ़ती गई और वह तंबाकू, गुटखा, शराब, स्मैक, गांजा और इंजेक्शन के जरिए लिए जाने वाले नशीले पदार्थों का सेवन करने लगे।
लंबे समय तक नशे की गिरफ्त में रहने के कारण उनकी शारीरिक और मानसिक स्थिति प्रभावित होने लगी। उनके व्यवहार में भी बदलाव आया, जिससे परिवार के साथ रिश्तों पर असर पड़ा। नशे की आदत ने उनकी आर्थिक स्थिति और सामाजिक जीवन को भी मुश्किल में डाल दिया।
परिवार पर बढ़ने लगा आर्थिक और मानसिक दबाव
इमरान एक आर्थिक रूप से कमजोर परिवार से आते हैं। उनके परिवार में दो भाई और छह बहनें हैं। उनकी नशे की लत से घर में आर्थिक परेशानियां बढ़ने लगीं। परिवार के सदस्य उनकी सेहत और भविष्य को लेकर चिंतित रहते थे।
इमरान ने एसी रिपेयरिंग और दूसरे मैकेनिकल काम सीख रखे थे, लेकिन उनकी कमाई का बड़ा हिस्सा नशे पर खर्च हो जाता था। इस वजह से वह आर्थिक रूप से स्थिर नहीं हो पा रहे थे।
एक तरफ परिवार की जिम्मेदारियां थीं, तो दूसरी तरफ नशे की आदत से छुटकारा पाना उनके लिए चुनौती बना हुआ था। इन परिस्थितियों में परिवार ने उनका साथ नहीं छोड़ा और उन्हें इलाज कराने के लिए प्रेरित किया।
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पुनर्वास केंद्र में मिला इलाज और काउंसलिंग का सहारा
इमरान को 22 अक्टूबर 2019 को गोरखपुर के सोनबरसा स्थित बासुदेव तिवारी सेवा संस्थान द्वारा संचालित पुनर्जन्म एकीकृत नशा मुक्ति एवं पुनर्वास केंद्र (IRCA) में सहायता मिली।
यहां उन्हें नशे की लत से उबरने के लिए चिकित्सा उपचार और डिटॉक्सिफिकेशन से जुड़ी देखभाल उपलब्ध कराई गई। इसके साथ ही मनोवैज्ञानिक परामर्श, प्रेरक थेरेपी और व्यवस्थित पुनर्वास कार्यक्रम के माध्यम से उनकी सुधार प्रक्रिया को आगे बढ़ाया गया।
केंद्र में उन्हें सुरक्षित आवास, पौष्टिक भोजन, आवश्यक दवाइयां, भावनात्मक सहयोग और परिवार परामर्श जैसी सुविधाएं भी मिलीं। इसके अलावा, दोबारा नशे की लत से बचने और रोजगार के जरिए जीवन को व्यवस्थित करने के लिए मार्गदर्शन दिया गया।
तीन महीने के पुनर्वास से जिंदगी में आया बदलाव
उचित उपचार, नियमित देखभाल और परिवार के प्रोत्साहन से इमरान ने धीरे-धीरे अपने जीवन में सुधार करना शुरू किया। पुनर्वास कार्यक्रम के दौरान उन्हें आत्मविश्वास बढ़ाने और खुद पर नियंत्रण विकसित करने में मदद मिली।
उन्होंने तीन महीने का पुनर्वास कार्यक्रम पूरा किया। इस प्रक्रिया ने उन्हें नशे से दूर रहने, परिवार के साथ संबंध बेहतर बनाने और अपने काम पर दोबारा ध्यान केंद्रित करने में सहायता दी।
इमरान की कहानी यह भी बताती है कि नशे की लत से उबरने में केवल इच्छाशक्ति ही नहीं, बल्कि चिकित्सा सहायता, मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं और लगातार सामाजिक सहयोग भी महत्वपूर्ण हैं।
अब एसी मैकेनिक बनकर कमा रहे हैं ₹30,000 से ₹40,000 महीना
नशामुक्त जीवन की ओर बढ़ने के बाद इमरान ने अपने हुनर को दोबारा रोजगार का आधार बनाया। आज वह एसी मैकेनिक के रूप में स्वरोजगार कर रहे हैं और अन्य मैकेनिकल काम भी करते हैं।
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, उनकी मासिक कमाई लगभग 30,000 से 40,000 रुपये तक पहुंच गई है। अब वह परिवार के खर्चों में योगदान देते हैं और घर की आर्थिक स्थिति मजबूत करने में मदद कर रहे हैं।
इस बदलाव से उन्हें परिवार का भरोसा दोबारा हासिल करने और समाज में सम्मान के साथ जीवन बिताने का अवसर मिला है। उनकी कहानी दिखाती है कि नशे की लत से उबरने के बाद कौशल और रोजगार व्यक्ति को आत्मनिर्भर बनने में मदद कर सकते हैं।
नशे की लत से उबरने में परिवार और पुनर्वास की अहम भूमिका
इमरान का अनुभव बताता है कि नशे की समस्या से जूझ रहे व्यक्ति को दोष देने या उससे दूरी बनाने के बजाय सही इलाज और सहयोग उपलब्ध कराना जरूरी है। समय पर विशेषज्ञों की मदद मिलने से व्यक्ति को अपनी स्थिति सुधारने और दोबारा सामान्य जीवन शुरू करने में सहायता मिल सकती है।
नशामुक्ति की प्रक्रिया हर व्यक्ति के लिए अलग हो सकती है। इसलिए चिकित्सा विशेषज्ञों की सलाह, मनोवैज्ञानिक परामर्श, परिवार का सहयोग और पुनर्वास के बाद नियमित देखभाल महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

