छिंदवाड़ा में जीरो टिलेज तकनीक से चना बोवनी का प्रदर्शन हुआ। जानें कैसे बिना जुताई खेती से डीजल, मजदूरी और लागत बचाने में मदद मिल सकती है।
किसानों को आधुनिक कृषि तकनीकों से जोड़ने और खेती की लागत कम करने के उद्देश्य से छिंदवाड़ा में जीरो टिलेज (बिना जुताई) तकनीक से चना बोवनी का प्रदर्शन आयोजित किया गया। कृषि विभाग की ओर से आयोजित इस प्रदर्शन में उप संचालक कृषि श्री मोरिस नाथ उपस्थित रहे। कार्यक्रम के दौरान किसानों को बिना पारंपरिक जुताई किए चने की बुवाई करने की तकनीक, मिट्टी की नमी का संरक्षण और फसल अवशेषों के वैज्ञानिक प्रबंधन की जानकारी दी गई।
इस पहल का मुख्य उद्देश्य किसानों को ऐसी कृषि पद्धतियों के प्रति जागरूक करना है, जिनसे समय, डीजल और मजदूरी की बचत के साथ उत्पादन लागत को नियंत्रित किया जा सके।
जीरो टिलेज मशीन से की गई चने की बुवाई
प्रदर्शन के दौरान विशेष जीरो टिलेज मशीन की सहायता से बिना खेत की पारंपरिक जुताई किए चने की बोवनी की गई। कृषि विभाग के अधिकारियों ने बताया कि इस तकनीक में खेत की बार-बार जुताई और तैयारी करने की आवश्यकता कम हो जाती है। इससे किसानों को समय पर बुवाई करने और उपलब्ध संसाधनों का बेहतर उपयोग करने में मदद मिल सकती है।
कार्यक्रम में परियोजना संचालक आत्मा श्री धीरज ठाकुर, सहायक कृषि अभियंत्रिकी श्री अश्विनी सिंह, सहायक संचालक कृषि श्री दीपक चौरसिया, बीटीएम श्रीमती प्रिया कराड़े, एटीएम श्री योगेश चोपड़े, एईओ श्री पंकज पराड़कर, राजा भोज से श्रीमती नंदिनी लाड़े तथा प्रगतिशील किसान श्री रघुवर भादे मौजूद रहे।
कम पानी वाली फसलों को प्राथमिकता देने की अपील
उप संचालक कृषि श्री मोरिस नाथ ने किसानों को रबी सीजन में कम पानी की आवश्यकता वाली फसलों की खेती पर ध्यान देने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि कम वर्षा और सीमित सिंचाई संसाधनों की स्थिति को देखते हुए चना, मसूर, सरसों और अलसी जैसी फसलें उपयोगी विकल्प हो सकती हैं।
उन्होंने किसानों से अपनी जमीन की प्रकृति, खेत में उपलब्ध नमी और सिंचाई के साधनों को ध्यान में रखकर फसल का चयन करने की अपील की। उनके अनुसार, जल संसाधनों का विवेकपूर्ण इस्तेमाल और उपयुक्त फसल का चुनाव खेती की लागत कम करने तथा मौसम संबंधी जोखिमों को घटाने में सहायक हो सकता है।
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आधुनिक कृषि तकनीक से समय और लागत की बचत
परियोजना संचालक आत्मा श्री धीरज ठाकुर ने किसानों को जीरो टिलेज जैसी आधुनिक कृषि तकनीकों को अपनाने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने बताया कि इस पद्धति में विशेष मशीन की मदद से बिना पारंपरिक जुताई किए सीधे बीज बोए जाते हैं।
इससे खेत तैयार करने में लगने वाला समय, डीजल की खपत और मजदूरी का खर्च कम हो सकता है। उपयुक्त परिस्थितियों में जीरो टिलेज तकनीक मिट्टी में मौजूद नमी के बेहतर उपयोग और समय पर बुवाई करने में भी मदद करती है।
नरवाई न जलाएं, फसल अवशेषों का करें उचित प्रबंधन
कृषि विभाग ने किसानों से फसल कटाई के बाद बचने वाली नरवाई को नहीं जलाने की अपील की। अधिकारियों के अनुसार, नरवाई जलाने से मिट्टी में मौजूद लाभकारी सूक्ष्मजीव प्रभावित हो सकते हैं और वायु प्रदूषण बढ़ता है।
किसानों को उपलब्ध कृषि मशीनों के माध्यम से फसल अवशेषों का वैज्ञानिक तरीके से प्रबंधन करने की सलाह दी गई। अनुकूल परिस्थितियों में जीरो टिलेज तकनीक से फसल अवशेषों के बीच सीधे बुवाई करने से मिट्टी की नमी बनाए रखने और उसकी संरचना के संरक्षण में मदद मिल सकती है।
किसानों के लिए उपयोगी पहल
छिंदवाड़ा में आयोजित यह प्रदर्शन कम लागत वाली खेती, जल संरक्षण, आधुनिक कृषि यंत्रों के उपयोग और नरवाई प्रबंधन को बढ़ावा देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। ऐसी तकनीकों को स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार अपनाकर किसान उपलब्ध संसाधनों का बेहतर उपयोग कर सकते हैं और खेती से जुड़े खर्चों को नियंत्रित करने की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं।

