शामली में सब्जियों पर कीटों का प्रकोप बढ़ा। उद्यान विभाग ने फल मक्खी, सफेद मक्खी और फल छेदक से बचाव के उपाय बताए, जानें पूरी एडवाइजरी।
उत्तर प्रदेश के शामली जिले में इस समय कई सब्जी फसलों में अलग-अलग कीटों का प्रकोप देखने को मिल रहा है। लौकी, कद्दू, करेला, तोरई, खीरा, बैंगन, मिर्च और टमाटर जैसी फसलों में कीटों की सक्रियता बढ़ने के बाद जिला उद्यान विभाग ने किसानों को सतर्क रहने की सलाह दी है। जिला उद्यान अधिकारी रचना सिंह ने फसलों के अनुसार कीटों की पहचान और उनके नियंत्रण के लिए जरूरी उपाय बताए हैं।
बारिश के बाद वातावरण में बढ़ी नमी और तापमान सब्जियों में कई प्रकार के कीटों के लिए अनुकूल परिस्थितियां बना रहे हैं। ऐसे में किसानों को खेतों की नियमित निगरानी करने और शुरुआती स्तर पर ही कीटों की पहचान कर नियंत्रण उपाय अपनाने की सलाह दी गई है। समय पर प्रबंधन नहीं होने पर कीट फसल की गुणवत्ता और उत्पादन दोनों को प्रभावित कर सकते हैं।
कद्दूवर्गीय सब्जियों में फल मक्खी का खतरा
लौकी, कद्दू, करेला, तोरई और खीरा जैसी कद्दूवर्गीय फसलों में फल मक्खी का प्रकोप देखा जा रहा है। यह कीट फलों में अंडे देता है और इसके बाद निकलने वाली सूंडियां फल के अंदर से उसे नुकसान पहुंचाती हैं। इससे फल सड़ने लगता है और बाजार में उसकी गुणवत्ता खराब हो जाती है।
फल मक्खी के नियंत्रण के लिए प्रति हेक्टेयर 15 से 20 क्यू-ल्योर फेरोमोन ट्रैप लगाने की सलाह दी गई है। इसके अलावा जैविक नियंत्रण के लिए नीम सीड कर्नेल एक्सट्रैक्ट का 3 से 5 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव किया जा सकता है। खेत में जो फल कीट से प्रभावित दिखाई दें, उन्हें तुरंत तोड़कर मिट्टी में दबा देने की सलाह भी दी गई है। इससे कीट के जीवन चक्र को आगे बढ़ने से रोकने में मदद मिल सकती है।
बैंगन में तना और फल छेदक से बचाव
बैंगन की फसल में तना एवं फल छेदक कीट किसानों के लिए परेशानी का कारण बन सकता है। यह कीट पौधे के तने और फलों में प्रवेश कर अंदर से नुकसान पहुंचाता है, जिससे पौधे की वृद्धि प्रभावित होती है और बाजार योग्य फल कम मिलते हैं।
इस कीट की निगरानी और नियंत्रण के लिए प्रति हेक्टेयर 40 से 50 फेरोमोन ट्रैप लगाने की सलाह दी गई है। यदि प्रकोप अधिक दिखाई देता है, तो कृषि विशेषज्ञों की अनुशंसा के अनुसार फ्लुबेंडियामाइड या क्लोरेन्ट्रानिलीप्रोल का 0.3 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी की दर से प्रयोग किया जा सकता है।
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मिर्च और टमाटर में सफेद मक्खी का प्रकोप
मिर्च और टमाटर की फसल भी सफेद मक्खी के हमले से प्रभावित हो सकती है। यह कीट पौधों की पत्तियों से रस चूसकर उन्हें कमजोर करता है। इसके अलावा सफेद मक्खी कुछ वायरस जनित रोगों के प्रसार का माध्यम भी बन सकती है, जिससे फसल को अतिरिक्त नुकसान होने की आशंका रहती है।
सफेद मक्खी की निगरानी के लिए प्रति हेक्टेयर 35 से 40 पीले या नीले चिपचिपे ट्रैप लगाने की सलाह दी गई है। इसके साथ ही नीम तेल का 3 से 5 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी की मात्रा में घोल बनाकर छिड़काव किया जा सकता है। किसानों को सलाह दी गई है कि किसी भी कीटनाशक का इस्तेमाल फसल में कीट की वास्तविक स्थिति का आकलन करने के बाद ही करें।
फेरोमोन ट्रैप से कम किया जा सकता है रासायनिक दवाओं का इस्तेमाल
उद्यान विभाग के अनुसार फेरोमोन ट्रैप और चिपचिपे जाल जैसे गैर-रासायनिक उपायों को प्राथमिकता देने से कीटों की निगरानी के साथ-साथ अनावश्यक कीटनाशक खर्च को भी कम किया जा सकता है। इन ट्रैप के माध्यम से किसान खेत में कीटों की मौजूदगी और उनकी संख्या का अंदाजा लगा सकते हैं। इससे जरूरत के अनुसार ही रासायनिक नियंत्रण का निर्णय लेने में मदद मिलती है।
विभाग ने किसानों को सलाह दी है कि फसल में कीट दिखाई देने पर तुरंत अत्यधिक मात्रा में दवाओं का छिड़काव न करें। पहले कीट की पहचान और प्रकोप का स्तर जांचना जरूरी है। इसके बाद ही अनुशंसित उपाय अपनाने चाहिए।
सब्जियों की तुड़ाई से पहले रखें इस बात का ध्यान
किसानों को कीटनाशकों के इस्तेमाल के बाद फसल की तुड़ाई करने से पहले संबंधित दवा की निर्धारित प्रतीक्षा अवधि का पालन करना चाहिए। इससे सब्जियों में कीटनाशक अवशेष की समस्या को कम करने में मदद मिलती है और उपभोक्ताओं के लिए उपज अधिक सुरक्षित रहती है।
शामली में बड़े स्तर पर सब्जियों की खेती को देखते हुए उद्यान विभाग ने किसानों से नियमित रूप से खेतों का निरीक्षण करने और कीटों के शुरुआती लक्षण दिखाई देने पर तुरंत उचित प्रबंधन अपनाने की अपील की है। समय पर कीट नियंत्रण से फसल की गुणवत्ता बनाए रखने के साथ किसानों को संभावित आर्थिक नुकसान से भी बचाया जा सकता है।

