NRCC और कृषि विश्वविद्यालय जोधपुर के बीच MoU हुआ। इससे ऊंट संरक्षण, नस्ल सुधार, ऊंटनी के दूध के प्रसंस्करण और पशुपालकों की आय बढ़ाने को बढ़ावा मिलेगा।
राजस्थान में ऊंटों के संरक्षण, बेहतर स्वास्थ्य प्रबंधन और ऊंटनी के दूध से जुड़े व्यवसायों को बढ़ावा देने के लिए एक महत्वपूर्ण पहल की गई है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के राष्ट्रीय उष्ट्र अनुसंधान केंद्र (NRCC), बीकानेर और कृषि विश्वविद्यालय, जोधपुर के बीच समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए गए हैं। इस साझेदारी का उद्देश्य ऊंटों की घटती संख्या को रोकना, नस्ल सुधार को प्रोत्साहित करना तथा ऊंटनी के दूध के प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन के माध्यम से पशुपालकों की आय बढ़ाना है।
कृषि विश्वविद्यालय, जोधपुर में आयोजित कार्यक्रम में NRCC के निदेशक डॉ. अनिल कुमार पूनिया और विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रोफेसर वीरेंद्र सिंह जैतावत ने समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए। इस अवसर पर ICAR-केंद्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान (CAZRI), जोधपुर के निदेशक डॉ. एच.एस. जाट भी उपस्थित रहे।
ऊंटनी के दूध से बढ़ेंगे कारोबार और रोजगार के अवसर
NRCC के निदेशक डॉ. अनिल कुमार पूनिया ने कहा कि यह समझौता ऊंट संरक्षण के साथ-साथ ऊंट पालने वाले परिवारों की आजीविका मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। उन्होंने ऊंटनी के दूध की उपयोगिता का उल्लेख करते हुए कहा कि इसके गुणों के बारे में लोगों को जागरूक करने के लिए संस्थान पिछले दो दशकों से प्रयास कर रहा है।
उन्होंने कहा कि अब ऊंटनी के दूध से बनने वाले उत्पादों को व्यापक बाजार तक पहुंचाने की जरूरत है। इसके लिए दूध का वैज्ञानिक प्रसंस्करण, नए उत्पादों का विकास, गुणवत्ता सुधार, व्यावसायिक उत्पादन और प्रभावी विपणन व्यवस्था को बढ़ावा देना होगा।
इस दिशा में काम करने से पशुपालकों को पारंपरिक पशुपालन के साथ नए व्यवसाय शुरू करने के अवसर मिल सकते हैं। साथ ही, ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार सृजन और ऊंटनी के दूध पर आधारित उद्यमिता को भी प्रोत्साहन मिलने की संभावना है।
राजस्थान में ऊंटों की घटती संख्या पर चिंता
कृषि विश्वविद्यालय, जोधपुर के कुलगुरु प्रोफेसर वीरेंद्र सिंह जैतावत ने राजस्थान के राज्य पशु ऊंट की घटती आबादी पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि ऊंटों का संरक्षण, बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं और वैज्ञानिक नस्ल सुधार समय की महत्वपूर्ण जरूरत हैं।
उन्होंने बताया कि रेगिस्तानी क्षेत्रों में कृषि और पशुपालन एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। ऐसे में दोनों संस्थानों के बीच सहयोग से पश्चिमी राजस्थान में कृषि एवं पशुधन संबंधी अनुसंधान को नई दिशा मिल सकती है।
इस साझेदारी से विद्यार्थियों, शोधार्थियों और पशुपालकों को भी लाभ मिलने की उम्मीद है। वैज्ञानिक अनुसंधान और आधुनिक तकनीकों के उपयोग से ऊंटों के स्वास्थ्य, प्रजनन और संरक्षण से जुड़ी चुनौतियों का समाधान खोजने में मदद मिल सकती है।
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‘ऊंट बचाओ अभियान’ को मजबूत करने पर जोर
CAZRI, जोधपुर के निदेशक डॉ. एच.एस. जाट ने ऊंटों के संरक्षण के लिए सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता बताई। उन्होंने कहा कि ‘ऊंट बचाओ अभियान’ को प्रभावी बनाने के लिए वैज्ञानिक संस्थानों, संबंधित विभागों और पशुपालकों को मिलकर काम करना चाहिए।
ऊंट राजस्थान की मरुस्थलीय संस्कृति, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और पशुपालन परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसकी संख्या में गिरावट को रोकने के लिए संरक्षण संबंधी जागरूकता और व्यावहारिक उपायों को बढ़ावा देना जरूरी है।
वैज्ञानिक अनुसंधान और आधुनिक तकनीकों को मिलेगा बढ़ावा
कार्यक्रम में NRCC की पीएमई सेल के प्रभारी डॉ. राकेश रंजन ने संस्थान की अनुसंधान गतिविधियों, तकनीकी नवाचारों और कार्यप्रणाली की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि इस समझौते का उद्देश्य पश्चिमी राजस्थान में ऊंट संरक्षण, संवर्धन और कृषि-पशुपालन आधारित शोध को गति देना है।
बोर्ड ऑफ मैनेजमेंट की सदस्य भावना शर्मा ने इस पहल को ग्रामीण अर्थव्यवस्था और पशुधन विकास के लिए उपयोगी बताया। कार्यक्रम के अंत में केकेवीके की नोडल अधिकारी डॉ. प्रियंका स्वामी ने उपस्थित अतिथियों और प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया।
इस अवसर पर वित्त नियंत्रक एवं लिंक ऑफिसर मेवाराम बालन, विश्वविद्यालय के विभिन्न संकायों के डीन और निदेशक, वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. प्रदीप पगारिया सहित अन्य अधिकारी भी मौजूद रहे।
पशुपालकों की आय बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल
NRCC और कृषि विश्वविद्यालय, जोधपुर के बीच हुआ यह समझौता ऊंट संरक्षण और ऊंटनी के दूध पर आधारित उद्योगों को विकसित करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। वैज्ञानिक सहयोग, बेहतर पशु स्वास्थ्य सेवाओं, नस्ल सुधार और दूध उत्पादों के मूल्य संवर्धन से राजस्थान के पशुपालकों के लिए आय के नए रास्ते खुल सकते हैं।
यदि इन प्रयासों को प्रभावी तरीके से लागू किया जाता है, तो इससे ऊंटों के संरक्षण के साथ मरुस्थलीय क्षेत्रों में पशुपालन आधारित रोजगार, उद्यमिता और ग्रामीण विकास को भी मजबूती मिल सकती है।

