NAMASTE योजना की मदद से गाजियाबाद के संजय कुमार संविदा सफाईकर्मी से उद्यमी बने। जानें कैसे 9.55 लाख रुपये की परियोजना से उनकी आय बढ़कर 60-65 हजार रुपये प्रतिमाह हुई।
उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद के रहने वाले संजय कुमार ने राष्ट्रीय मशीनीकृत स्वच्छता पारिस्थितिकी तंत्र कार्य योजना (NAMASTE) के तहत मिलने वाली वित्तीय सहायता से अपनी जिंदगी में बड़ा बदलाव किया है। कभी संविदा पर सफाई का काम करने वाले संजय आज अपना मशीनीकृत स्वच्छता सेवा व्यवसाय चला रहे हैं। इस पहल ने उन्हें न केवल स्वरोजगार का अवसर दिया, बल्कि परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत करने और वित्तीय आत्मनिर्भरता हासिल करने में भी मदद की है।
12 हजार रुपये की मासिक आय से शुरू हुआ था सफर
उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद निवासी 42 वर्षीय संजय कुमार छह सदस्यों वाले परिवार के इकलौते कमाने वाले सदस्य थे। वह संविदा सफाईकर्मी के रूप में काम करते थे और उनकी मासिक आय लगभग 12,000 रुपये थी। सीमित कमाई के कारण परिवार का खर्च चलाना, जरूरी जरूरतें पूरी करना और भविष्य के लिए बचत करना उनके लिए मुश्किल था।
संजय ने माध्यमिक स्तर तक शिक्षा प्राप्त की थी। सीमित शैक्षणिक योग्यता और रोजगार के कम विकल्पों के चलते उनकी आय बढ़ाने की संभावनाएं भी सीमित थीं। हालांकि, वह अपनी आर्थिक स्थिति सुधारना चाहते थे और परिवार को बेहतर जीवन देने के लिए खुद का व्यवसाय शुरू करने का सपना देखते थे।
उनकी इच्छा मशीनीकृत सफाई वाहन खरीदकर स्वच्छता सेवाओं के क्षेत्र में स्वतंत्र रूप से काम करने की थी। लेकिन पर्याप्त पूंजी नहीं होने के कारण वह अपने इस सपने को पूरा नहीं कर पा रहे थे।
NAMASTE योजना से मिली व्यवसाय शुरू करने में मदद
संजय कुमार के जीवन में बदलाव तब आया, जब उन्होंने गाजियाबाद नगर निगम की ओर से आयोजित एक जागरूकता शिविर में भाग लिया। यहां उन्हें केंद्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय द्वारा संचालित राष्ट्रीय मशीनीकृत स्वच्छता पारिस्थितिकी तंत्र योजना यानी NAMASTE के अंतर्गत स्वच्छता उद्यमी योजना की जानकारी मिली।
इस योजना के माध्यम से उन्हें अपना स्वच्छता सेवा व्यवसाय शुरू करने के लिए वित्तीय सहायता प्राप्त करने का अवसर मिला। संजय को केनरा बैंक से गाद निकालने वाले वाहन की खरीद के लिए ऋण मिला। इसके साथ ही मंत्रालय की ओर से पूंजीगत सब्सिडी भी प्रदान की गई।
इस वित्तीय सहायता ने उनके लिए खुद का वाहन खरीदने और संविदा पर काम करने के बजाय स्वतंत्र रूप से मशीनीकृत स्वच्छता सेवाएं देने का रास्ता खोल दिया।
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9.55 लाख रुपये की परियोजना से खरीदा सफाई वाहन
संजय कुमार के स्वच्छता व्यवसाय की कुल परियोजना लागत 9.55 लाख रुपये थी। इसमें बैंक ऋण और सरकारी पूंजीगत सब्सिडी की अहम भूमिका रही।
परियोजना के तहत उन्हें केनरा बैंक से 5.91 लाख रुपये का ऋण मिला, जबकि 3.64 लाख रुपये की पूंजीगत सब्सिडी उपलब्ध कराई गई। वर्ष 2021-22 के दौरान मिली इस सहायता से उन्होंने गाद निकालने वाला वाहन खरीदा और मशीनीकृत स्वच्छता सेवाओं के क्षेत्र में अपना स्वरोजगार शुरू किया।
इस तरह संजय कुमार संविदा कर्मचारी से स्वच्छता सेवा उद्यमी बनने की दिशा में आगे बढ़े। उनका व्यवसाय अब परिवार की आय का एक बेहतर साधन बन गया है।
अब हर महीने 60 से 65 हजार रुपये तक की कमाई
NAMASTE योजना के तहत मिली सहायता का असर संजय कुमार की आय पर भी दिखाई दिया है। पहले जहां वह संविदा सफाईकर्मी के तौर पर लगभग 12,000 रुपये प्रतिमाह कमाते थे, वहीं अब उनके स्वच्छता सेवा व्यवसाय से करीब 60,000 से 65,000 रुपये की मासिक आय होती है।
परिचालन खर्चों को पूरा करने के बाद वह हर महीने लगभग 25,000 रुपये की बचत कर पाते हैं। आय में हुई इस बढ़ोतरी से उनके परिवार की आर्थिक स्थिति पहले से बेहतर हुई है। अब वह घरेलू जरूरतों को पूरा करने के साथ भविष्य की वित्तीय आवश्यकताओं के लिए भी योजना बना सकते हैं।
सफाई कर्मचारियों को उद्यमी बनाने में NAMASTE योजना की भूमिका
संजय कुमार की सफलता की कहानी बताती है कि सही मार्गदर्शन, बैंक ऋण और सरकारी वित्तीय सहायता से सफाई कर्मचारियों के लिए स्वरोजगार के नए अवसर तैयार किए जा सकते हैं।
NAMASTE योजना का उद्देश्य स्वच्छता कार्यों को अधिक सुरक्षित और मशीनीकृत बनाने के साथ सफाई कर्मचारियों के लिए बेहतर आजीविका के अवसरों को बढ़ावा देना है। मशीनीकृत उपकरणों और वाहनों के इस्तेमाल से स्वच्छता सेवाओं को व्यवस्थित करने तथा इस क्षेत्र में उद्यमिता को प्रोत्साहित करने में मदद मिल सकती है।
संजय कुमार का अनुभव इस बात का उदाहरण है कि लक्षित वित्तीय सहायता किसी व्यक्ति को सीमित आय वाले रोजगार से आगे बढ़कर अपना व्यवसाय स्थापित करने में मदद कर सकती है।
वित्तीय आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ते कदम
गाजियाबाद के संजय कुमार ने NAMASTE योजना के सहयोग से अपनी आर्थिक परिस्थितियों को बदलने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया है। संविदा सफाईकर्मी से स्वच्छता सेवा उद्यमी बनने तक का उनका सफर दिखाता है कि वित्तीय संसाधनों तक पहुंच मिलने पर व्यक्ति अपनी क्षमता और मेहनत के दम पर नए अवसरों का लाभ उठा सकता है।
उनकी कहानी न केवल स्वरोजगार को बढ़ावा देने में सरकारी योजनाओं की भूमिका को सामने लाती है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि आर्थिक आत्मनिर्भरता परिवार के जीवन स्तर को बेहतर बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दे सकती है।

