दलहन बीज सब्सिडी 2026 के तहत तुअर, उड़द और मसूर के प्रमाणित बीज पर 100% तक सब्सिडी और ₹12,000 प्रति क्विंटल तक लाभ की पूरी जानकारी जानें।
दलहन की खेती करने वाले किसानों के लिए केंद्र सरकार ने बीज सब्सिडी से जुड़े नियमों में अहम बदलाव किया है। दलहन आत्मनिर्भरता मिशन के तहत तुअर, उड़द और मसूर की नई प्रमाणित किस्मों के बीज पर अब 100 प्रतिशत तक सब्सिडी का प्रावधान किया गया है। इस योजना के अंतर्गत किसानों को अधिकतम ₹12,000 प्रति क्विंटल तक की आर्थिक सहायता मिल सकती है। सरकार के इस कदम का उद्देश्य किसानों को बेहतर गुणवत्ता वाले बीज अपनाने के लिए प्रोत्साहित करना और देश में दलहन उत्पादन बढ़ाना है।
दलहन बीज सब्सिडी योजना में क्या हुआ बदलाव?
केंद्र सरकार ने दलहन फसलों के प्रमाणित बीजों पर मिलने वाली सहायता राशि बढ़ाने के लिए संशोधित दिशानिर्देश जारी किए हैं। पहले कई श्रेणियों में बीज की लागत पर 50 प्रतिशत तक सहायता मिलती थी, लेकिन अब पात्र किस्मों के लिए सब्सिडी की सीमा बढ़ा दी गई है।
इस फैसले से तुअर, उड़द और मसूर की खेती करने वाले किसानों को खास फायदा मिलने की उम्मीद है। प्रमाणित बीज महंगे होने के कारण कई किसान इनका इस्तेमाल करने से बचते थे। नई व्यवस्था से बीज खरीदने का आर्थिक बोझ कम करने और बेहतर किस्मों को बढ़ावा देने में मदद मिल सकती है।
नई किस्मों के बीज पर मिलेगी 100% तक सब्सिडी
संशोधित नियमों के अनुसार, पिछले पांच वर्षों के भीतर जारी की गई तुअर, उड़द और मसूर की पात्र किस्मों के प्रमाणित बीज पर पूरी लागत तक सब्सिडी दी जा सकती है। हालांकि, इसके लिए अधिकतम सहायता सीमा ₹12,000 प्रति क्विंटल निर्धारित की गई है।
वहीं, चना और अन्य दलहन फसलों के बीज पर 75 प्रतिशत तक या अधिकतम ₹6,000 प्रति क्विंटल की सहायता का प्रावधान है। किसानों को मिलने वाली वास्तविक सब्सिडी निर्धारित नियमों और पात्रता के अनुसार तय होगी।
पुरानी किस्मों के बीज पर कितनी मिलेगी मदद?
बीज की किस्म जारी होने की अवधि के आधार पर सब्सिडी की दर अलग-अलग रखी गई है। पांच से दस साल पुरानी किस्मों के लिए सहायता का प्रावधान इस प्रकार है:
- तुअर, उड़द और मसूर: बीज की लागत का 75 प्रतिशत तक या अधिकतम ₹9,000 प्रति क्विंटल।
- चना और अन्य दलहन: बीज की लागत का 50 प्रतिशत तक या अधिकतम ₹4,000 प्रति क्विंटल।
इन मामलों में निर्धारित प्रतिशत और अधिकतम राशि में से जो सीमा लागू होती है, उसी के अनुसार सहायता मिलेगी।
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महाराष्ट्र के कृषि मंत्री ने की थी सब्सिडी बढ़ाने की मांग
दलहन बीज सब्सिडी में बढ़ोतरी की मांग महाराष्ट्र के कृषि मंत्री दत्तात्रेय भरणे ने उठाई थी। उन्होंने जुलाई 2026 में केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान को पत्र लिखकर प्रमाणित बीजों पर मिलने वाली सहायता 50 प्रतिशत से बढ़ाकर 100 प्रतिशत करने का आग्रह किया था।
उनका कहना था कि बीज की अधिक कीमत किसानों के लिए नई और प्रमाणित किस्में अपनाने में बाधा बन रही है। इसका असर फसल की उत्पादकता पर भी पड़ सकता है। इसके बाद केंद्र सरकार ने 28 अगस्त 2026 को संशोधित दिशानिर्देश जारी किए।
रबी सीजन में चना किसानों को मिल सकता है फायदा
रबी सीजन की बुवाई से पहले सब्सिडी में किया गया बदलाव किसानों के लिए उपयोगी साबित हो सकता है। चना समेत अन्य दलहन फसलों की खेती करने वाले किसान प्रमाणित बीज खरीदने से पहले अपने जिले के कृषि विभाग या संबंधित सहकारी समितियों से योजना की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
किसानों को सलाह दी जाती है कि बीज खरीदने से पहले पात्र किस्म, सब्सिडी की लागू दर, जरूरी दस्तावेज और आवेदन की प्रक्रिया की पुष्टि संबंधित विभाग से जरूर कर लें।
कृषि मैपर तकनीक के लिए भी सहायता
योजना में खेतों की सटीक माप और क्षेत्र संबंधी जानकारी जुटाने के लिए कृषि मैपर तकनीक के इस्तेमाल पर प्रति हेक्टेयर ₹30 की अलग सहायता का भी प्रावधान बताया गया है। इसका उद्देश्य खेतों का बेहतर आकलन करना और योजना के क्रियान्वयन को अधिक व्यवस्थित बनाना है।
प्रमाणित बीजों से किसानों को क्या होगा लाभ?
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, अच्छी गुणवत्ता वाले प्रमाणित बीज फसल उत्पादन में सुधार करने में मदद कर सकते हैं। इनका उपयोग करने से किसानों को बेहतर अंकुरण, उपयुक्त किस्मों के चयन और कुछ बीज-जनित रोगों से जुड़े जोखिम को कम करने में फायदा मिल सकता है। हालांकि, वास्तविक पैदावार मिट्टी, मौसम, सिंचाई, खाद और फसल प्रबंधन जैसे कई कारकों पर निर्भर करती है।
कई किसान लागत कम रखने के लिए लंबे समय तक अपने पास रखे बीजों का इस्तेमाल करते हैं। ऐसे में सब्सिडी मिलने से नई प्रमाणित किस्मों को अपनाना आर्थिक रूप से आसान हो सकता है।
दलहन उत्पादन बढ़ाना है सरकार का लक्ष्य
दलहन आत्मनिर्भरता मिशन का उद्देश्य तुअर, उड़द, मसूर, चना और मूंग जैसी प्रमुख फसलों का घरेलू उत्पादन बढ़ाना और आयात पर निर्भरता कम करना है। इसके लिए किसानों तक समय पर गुणवत्तापूर्ण बीज पहुंचाना महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
योजना के तहत बीज निगमों और राज्य कृषि विभागों की भूमिका भी अहम होगी। बीज की मांग का समय रहते आकलन करने और पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करने से किसानों को बुवाई के समय होने वाली परेशानियों से बचाया जा सकता है।

