सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पूर्व सैनिक का ब्रेन स्ट्रोक तंबाकू सेवन से जुड़ा है, सैन्य सेवा से नहीं; AFT का फैसला बरकरार रखते हुए दिव्यांगता पेंशन की अपील खारिज की।
दिव्यांगता पेंशन की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंचे एक पूर्व सैनिक को बड़ा झटका लगा है। अदालत ने साफ कहा कि याचिकाकर्ता को ब्रेन स्ट्रोक सैन्य सेवा के कारण नहीं, बल्कि तंबाकू सेवन (रोज करीब 10 बीड़ी) की आदत की वजह से हुआ। इस आधार पर आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल (AFT) के फैसले को बरकरार रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अपील खारिज कर दी।
इस मामले की सुनवाई जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस पी. बी. वराले की पीठ ने की। पीठ ने कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद मेडिकल रिपोर्ट और मेडिकल बोर्ड की राय स्पष्ट है कि स्ट्रोक का कारण याचिकाकर्ता की लाइफस्टाइल है, न कि सैन्य सेवा से जुड़ा कोई कारक।
याचिकाकर्ता ने पहले AFT में यह कहते हुए अपील की थी कि उन्हें स्ट्रोक ड्यूटी के दबाव और सेवा-परिस्थितियों की वजह से आया, इसलिए वे दिव्यांगता पेंशन के हकदार हैं। हालांकि, ट्रिब्यूनल ने मेडिकल साक्ष्यों और नियमों के आधार पर याचिका खारिज कर दी थी। इसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
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सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में ‘पेंशन रेगुलेशन फॉर द आर्मी, 1961’ के नियम 173 और ‘गाइड टू मेडिकल ऑफिसर्स, 2002’ के पैरा 6 का हवाला दिया। कोर्ट ने कहा कि यदि कोई दिव्यांगता शराब, तंबाकू या नशीली दवाओं के अत्यधिक सेवन जैसी आदतों से उत्पन्न होती है, जो व्यक्ति के अपने नियंत्रण में होती हैं, तो ऐसे मामलों में मुआवजा या दिव्यांगता पेंशन नहीं दी जा सकती।
पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि ट्रिब्यूनल ने नियमों के अनुरूप ही फैसला दिया है, इसलिए उसमें हस्तक्षेप की कोई जरूरत नहीं है। अदालत के अनुसार, जब बीमारी या चोट का सीधा और ठोस संबंध सेवा से साबित नहीं होता, तो पेंशन का दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता।
इस फैसले को सैन्य पेंशन मामलों में एक महत्वपूर्ण मिसाल माना जा रहा है, क्योंकि इससे यह स्पष्ट संदेश जाता है कि व्यक्तिगत आदतों से पैदा हुई स्वास्थ्य समस्याओं के लिए सेवा-आधारित मुआवजा नहीं दिया जाएगा।


