श्री सोमनाथ महादेव मंदिर भारत की अविनाशी वैभव, अटूट श्रद्धा और सनातन संस्कृति की अखंड चेतना का प्रतीक है। इसी गौरवशाली परंपरा को और सुदृढ़ करते हुए प्रभास तीर्थ में ‘सोमनाथ स्वाभिमान पर्व’ का भव्य आयोजन किया गया। माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी की गरिमामयी उपस्थिति ने इस आयोजन को ऐतिहासिक बना दिया, जिसने हर भारतीय के मन में सांस्कृतिक पुनरुत्थान की नई ऊर्जा का संचार किया।
कार्यक्रम के दौरान जब प्रभास तीर्थ की पवित्र भूमि पर सामूहिक ‘ओंकार’ का नाद गूंजा, तो वह केवल एक ध्वनि नहीं, बल्कि भारत के गौरवमयी भविष्य का दृढ़ संकल्प बनकर उभरा। यह क्षण सनातन परंपराओं की जीवंतता और आध्यात्मिक एकता का प्रतीक था, जिसने उपस्थित जनसमूह को भावविभोर कर दिया।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संबोधन में कहा कि सोमनाथ केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि भारत की आत्मा, आस्था और आत्मसम्मान का प्रतीक है। इतिहास के कठिन कालखंडों में भी सोमनाथ ने यह संदेश दिया कि भारत की संस्कृति को न तो नष्ट किया जा सकता है और न ही झुकाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि बार-बार पुनर्निर्माण की गाथा सोमनाथ को अविनाशी बनाती है और यह आने वाली पीढ़ियों को आत्मगौरव के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है।
‘सोमनाथ स्वाभिमान पर्व’ के माध्यम से भारत की सांस्कृतिक चेतना, सनातन मूल्यों और राष्ट्रीय आत्मविश्वास को सशक्त रूप में प्रस्तुत किया गया। इस अवसर पर धार्मिक अनुष्ठान, वैदिक मंत्रोच्चारण और सांस्कृतिक कार्यक्रमों ने वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया। देश के विभिन्न हिस्सों से आए श्रद्धालुओं और संतों ने इस आयोजन को सांस्कृतिक एकता का उत्सव बताया।
प्रधानमंत्री ने कहा कि आज का भारत अपनी विरासत पर गर्व करते हुए विकास की नई ऊंचाइयों की ओर अग्रसर है। सांस्कृतिक पुनरुत्थान और आधुनिक प्रगति—दोनों साथ-साथ चल रहे हैं। उन्होंने कहा कि जब राष्ट्र अपनी जड़ों से जुड़ा रहता है, तभी वह वैश्विक मंच पर आत्मविश्वास के साथ नेतृत्व कर सकता है।
कार्यक्रम में यह संदेश भी स्पष्ट रूप से उभरा कि सनातन संस्कृति केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य की मार्गदर्शक शक्ति है। सोमनाथ जैसे पवित्र स्थलों के माध्यम से भारत अपनी सांस्कृतिक पहचान को सहेजते हुए विश्व को शांति, सहिष्णुता और एकता का संदेश देता है।
अंत में, ‘सोमनाथ स्वाभिमान पर्व’ ने यह सिद्ध कर दिया कि भारत की आत्मा अडिग है। ओंकार की सामूहिक गूंज ने राष्ट्र को यह संकल्प दिलाया कि सांस्कृतिक गौरव, आध्यात्मिक चेतना और विकास के संयोग से भारत एक सशक्त, आत्मनिर्भर और गौरवशाली भविष्य की ओर निरंतर आगे बढ़ता रहेगा।


