प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के महान नायक, बल्लभगढ़ रियासत के वीर शासक राजा नाहर सिंह के बलिदान दिवस पर उन्हें शत्-शत् नमन। मातृभूमि की आज़ादी के लिए अपने सर्वस्व का त्याग करने वाले इस वीर शिरोमणि का जीवन साहस, त्याग और देशभक्ति का अद्भुत उदाहरण है। उनका बलिदान भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के स्वर्णिम अध्यायों में सदैव स्मरणीय रहेगा।
राजा नाहर सिंह का जन्म 1823 में बल्लभगढ़ रियासत में हुआ। वे न केवल एक कुशल प्रशासक थे, बल्कि दूरदर्शी और साहसी योद्धा भी थे। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान जब देश के विभिन्न हिस्सों में अंग्रेजी हुकूमत के विरुद्ध विद्रोह की ज्वाला भड़की, तब राजा नाहर सिंह ने भी विदेशी शासन को उखाड़ फेंकने का संकल्प लिया। उन्होंने अपने क्षेत्र में अंग्रेजों के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष का नेतृत्व किया और जनमानस को स्वतंत्रता के लिए एकजुट किया।
स्वाधीनता संग्राम में उनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। उन्होंने न केवल अपने सैनिकों को संगठित किया, बल्कि आसपास के क्षेत्रों के क्रांतिकारियों से भी समन्वय स्थापित किया। बल्लभगढ़ की धरती पर अंग्रेजी सत्ता को चुनौती देना आसान नहीं था, फिर भी राजा नाहर सिंह ने अदम्य साहस का परिचय देते हुए संघर्ष जारी रखा। उनका मानना था कि स्वतंत्रता केवल हथियारों से नहीं, बल्कि जनचेतना से भी प्राप्त होती है, इसी कारण उन्होंने जनता को जागरूक कर आंदोलन से जोड़ा।
अंग्रेजी सत्ता ने उनकी बढ़ती ताकत को खतरे के रूप में देखा और षड्यंत्र के तहत उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। 9 जनवरी 1858 को दिल्ली में उन्हें फांसी दी गई। यह क्षण भारतीय इतिहास का अत्यंत मार्मिक अध्याय है, जब एक वीर ने हंसते-हंसते देश के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। उनका बलिदान स्वतंत्रता की उस मशाल को और प्रज्ज्वलित कर गया, जिसने आगे चलकर देश को आज़ादी दिलाई।
आज भी हरियाणा सहित देशभर में राजा नाहर सिंह की वीरगाथा श्रद्धा के साथ स्मरण की जाती है। बल्लभगढ़ का ऐतिहासिक किला, स्मारक और उनसे जुड़ी धरोहरें आने वाली पीढ़ियों को उनके त्याग और संघर्ष की प्रेरणा देती हैं। बलिदान दिवस के अवसर पर विभिन्न सामाजिक, सांस्कृतिक और शैक्षणिक संस्थानों द्वारा उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की जाती है।
राजा नाहर सिंह जी का जीवन हमें यह सिखाता है कि देश की स्वतंत्रता और सम्मान के लिए किया गया त्याग कभी व्यर्थ नहीं जाता। वे हमारी स्मृतियों में सदैव अमर रहेंगे और उनकी वीरता आने वाली पीढ़ियों को राष्ट्रसेवा के लिए प्रेरित करती रहेगी।


