Petrol Diesel Price Hike: मुख्य बात यह है कि पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ाने का निर्णय किया गया है जब कच्चे तेल की कीमतें दुनिया भर में तीन साल के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई हैं।
Petrol Diesel Price Hike: 7 अप्रैल 2025 को मोदी सरकार ने डीजल और पेट्रोल की कीमतें बढ़ा दीं। केंद्रीय सरकार ने डीजल और पेट्रोल की कीमतों में दो रुपये की बढ़ोतरी की है। रात 12 बजे से डीजल और पेट्रोल पर नई दरें लागू होंगी। मुख्य बात यह है कि ये निर्णय दुनिया भर में कच्चे तेल की कीमतों में तीन साल के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गए हैं।
सस्ता हुआ कच्चा तेल
हाल ही में क्रूड ऑयल की कीमत 62 डॉलर प्रति बैरल तक गिर गई, जो अगस्त 2021 से पहले की सबसे कम दर है। इस गिरावट का कारण वैश्विक आर्थिक मंदी की आशंका और तेल की मांग में गिरावट है। अमेरिका का Nymex क्रूड सोमवार को 10% गिरकर 62 डॉलर पर पहुंच गया, जबकि ब्रेंट क्रूड की कीमत 63.23 डॉलर प्रति बैरल रही। साथ ही, सऊदी अरब ने लगातार दूसरे महीने तक एशिया के लिए अपनी प्रमुख ग्रेड ‘अरब लाइट’ की कीमत घटा दी है। इस महीने से, OPEC+ देशों ने उत्पादन कटौती में भी ढील दी है, जिससे बाजार में आपूर्ति बढ़ सकती है।
देश में उठ रहे सवाल
भारत सरकार ने तेल की कीमतें बढ़ा दी हैं, लेकिन लोगों को सवाल है कि देश में डीजल और पेट्रोल की कीमतें क्यों नहीं घट रही हैं, जब तेल विश्व बाजार में सस्ता हो गया है। बिजनेस लाइन ने बताया कि कांग्रेस नेता मनीष तिवारी ने सरकार से पूछा कि क्या ‘डायनामिक प्राइसिंग’ सिर्फ तब लागू होती है जब कीमतें बढ़ती हैं? जनता भी उम्मीद कर रही है कि पेट्रोल-डीजल की कीमतें कम होंगी, लेकिन सरकार ने अभी तक कोई स्पष्ट संकेत नहीं दिया है। इसके विपरीत, डीजल और पेट्रोल की कीमतें और अधिक बढ़ गई हैं।
तेल कंपनियां पैसा कमा रही हैं
भारत की तेल कंपनियों भी कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट से प्रभावित हैं। इंडियन ऑयल, एचपीसीएल और बीपीसीएल जैसी तेल मार्केटिंग कंपनियों (OMCs) का ऑटो फ्यूल मार्जिन 13 रुपये प्रति लीटर तक पहुंच गया है, जो आम तौर पर 3.5 से 6.2 रुपये प्रति लीटर था। लेकिन इन कंपनियों का मुनाफा प्रभावित हो सकता है अगर सरकार खुदरा कीमतें कम करती है या एक्साइज ड्यूटी बढ़ाती है।
इन कंपनियों को घाटा
ONGC और ऑयल इंडिया को इस गिरावट से नुकसान हो सकता है। JM फाइनेंशियल का अनुमान है कि इन कंपनियों में हर 1 डॉलर की कमी से प्रति शेयर आय (EPS) में 1.5-2 फीसदी की कमी हो सकती है। साथ ही, अमेरिकी शेल ऑयल कंपनियों का निवेश भी प्रभावित होगा अगर तेल की कीमत 70 डॉलर से नीचे बनी रहती है क्योंकि उनका ब्रेक-ईवन प्राइस 60 से 65 डॉलर प्रति बैरल होता है। साथ ही, सऊदी अरब का बजट 85 डॉलर प्रति बैरल की दर से संतुलित होने के कारण भी घाटा हो सकता है।
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