पंजाब विधानसभा अध्यक्ष कुलतार सिंह संधवान ने जम्मू-कश्मीर स्थित श्री माता वैष्णो देवी चिकित्सा उत्कृष्टता संस्थान की एमबीबीएस मान्यता रद्द किए जाने के केंद्र सरकार के फैसले पर कड़ी आपत्ति जताई है। उन्होंने कहा कि यह निर्णय न केवल सैकड़ों छात्रों के भविष्य के साथ अन्याय है, बल्कि शिक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्र को धर्म और राजनीति से जोड़ने की एक चिंताजनक प्रवृत्ति को भी दर्शाता है।
कुलतार सिंह संधवान ने स्पष्ट किया कि इस मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस पाठ्यक्रम में प्रवेश पूरी तरह से कानूनी और पारदर्शी प्रक्रिया के तहत हुए थे। सभी दाखिले केंद्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (NEET) की योग्यता के आधार पर किए गए थे, जिसे राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) ने भी मान्यता दी थी। ऐसे में अचानक मान्यता रद्द करना न केवल छात्रों के साथ अन्याय है, बल्कि संस्थागत निर्णय प्रक्रिया पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है।
उन्होंने कहा कि यदि संस्थान में वास्तव में गंभीर खामियां थीं, तो कुछ महीने पहले इसे एमबीबीएस पाठ्यक्रम की मान्यता किस आधार पर दी गई थी। उन्होंने सवाल उठाया कि चार महीने पहले निरीक्षण और मूल्यांकन के बाद मान्यता देने वाला राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग अब किस नए आधार पर अपना फैसला बदल रहा है। इस पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता का अभाव दिखाई देता है, जिसकी जवाबदेही तय की जानी चाहिए।
पंजाब विधानसभा अध्यक्ष ने यह भी कहा कि छात्रों के किसी विशेष धर्म से जुड़े होने के आधार पर मान्यता रद्द करने का तर्क पूरी तरह अस्वीकार्य और असंवैधानिक है। शिक्षा का उद्देश्य समाज को जोड़ना और ज्ञान का प्रसार करना है, न कि भेदभाव और विभाजन को बढ़ावा देना। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि शिक्षा को राजनीतिक या धार्मिक एजेंडे का हिस्सा बनाया गया, तो इसके दूरगामी नकारात्मक परिणाम होंगे।
कुलतार सिंह संधवान ने इस प्रवृत्ति पर भी चिंता व्यक्त की कि कुछ समूह शिक्षण संस्थानों को बंद कराने के लिए आंदोलन कर रहे हैं और मान्यता रद्द होने पर जश्न मना रहे हैं। उन्होंने कहा कि यह सामाजिक पतन का संकेत है। मेडिकल कॉलेज जैसे व्यावसायिक और पेशेवर संस्थानों को खामियों के आधार पर सुधार का अवसर दिए बिना बंद करना न तो न्यायसंगत है और न ही संविधान की भावना के अनुरूप है।
उन्होंने कहा कि यदि संस्थान में किसी प्रकार की कमी पाई गई है, तो उसे सुधारने के लिए समय और दिशा-निर्देश दिए जाने चाहिए थे, ताकि छात्रों का भविष्य सुरक्षित रह सके। सीधे तौर पर मान्यता रद्द करने से सबसे ज्यादा नुकसान उन छात्रों को होता है, जिनका इस विवाद से कोई लेना-देना नहीं है।
अंत में कुलतार सिंह संधवान ने केंद्र सरकार और राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग से इस फैसले की तत्काल समीक्षा करने की पुरजोर मांग की। उन्होंने कहा कि छात्रों के हित सर्वोपरि होने चाहिए और शिक्षा को हर हाल में धर्म व राजनीति से दूर रखा जाना चाहिए, ताकि देश का भविष्य सुरक्षित और मजबूत रह सके।


