दिल्ली विधानसभा में बुधवार को उस समय राजनीतिक माहौल तनावपूर्ण हो गया, जब सिख धर्म के नौवें गुरु श्री गुरु तेग बहादुर की शहादत पर चल रही चर्चा के दौरान सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी नोकझोंक हो गई। चर्चा के दौरान कथित टिप्पणी को लेकर मंत्री प्रवेश साहिब सिंह वर्मा ने नेता प्रतिपक्ष आतिशी पर गंभीर आरोप लगाए, जिसके बाद सदन का माहौल गरमा गया।
मंत्री प्रवेश वर्मा ने कहा कि जिस विषय पर सदन में चर्चा हो रही थी, वह न केवल सिख समाज बल्कि पूरे देश के लिए अत्यंत श्रद्धा और सम्मान का विषय है। ऐसे पवित्र और ऐतिहासिक मुद्दे पर किसी भी प्रकार की असंयमित या आपत्तिजनक भाषा लोकतांत्रिक परंपराओं के विपरीत है। उन्होंने आरोप लगाया कि नेता प्रतिपक्ष की टिप्पणी से सदन की भावनाएं आहत हुई हैं।
प्रवेश वर्मा ने कहा कि गुरु तेग बहादुर जी का बलिदान धर्म, मानवता और धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा के लिए था। ऐसे महान बलिदानी पर की गई कोई भी टिप्पणी केवल राजनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था से जुड़ा विषय है। उन्होंने इसे अस्वीकार्य बताते हुए सख्त कार्रवाई की मांग की।
इस मामले को लेकर मंत्री प्रवेश वर्मा के साथ मंत्री मनजिंदर सिंह सिरसा, कपिल मिश्रा, रविंद्र इंद्रराज सिंह और विधायक अभय वर्मा ने विधानसभा अध्यक्ष से मुलाकात की। इस दौरान विधानसभा अध्यक्ष को एक औपचारिक पत्र सौंपा गया, जिसमें नेता प्रतिपक्ष की सदस्यता रद्द करने और कथित बयान को लेकर एफआईआर दर्ज करने की मांग की गई।
मंत्रियों का कहना था कि इस तरह की घटनाओं पर समयबद्ध और निष्पक्ष कार्रवाई जरूरी है, ताकि भविष्य में कोई भी जनप्रतिनिधि संवेदनशील विषयों पर बोलते समय मर्यादा और जिम्मेदारी का ध्यान रखे। उन्होंने यह भी बताया कि कथित बयान की लिखित प्रति अध्यक्ष को सौंप दी गई है, ताकि तथ्यों के आधार पर जांच की जा सके।
इस घटनाक्रम के बाद दिल्ली की राजनीति में सरगर्मी तेज हो गई है। सत्ता पक्ष जहां इसे आस्था और सम्मान से जुड़ा गंभीर मामला बता रहा है, वहीं विपक्ष की ओर से इसे राजनीतिक दबाव और मुद्दे को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने का आरोप लगाए जाने की संभावना जताई जा रही है।
राजनीतिक जानकारों के अनुसार, आने वाले दिनों में यह मामला विधानसभा के भीतर और बाहर दोनों जगह चर्चा का विषय बना रह सकता है। गुरु तेग बहादुर जी की शहादत को लेकर उठे इस विवाद ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि संवेदनशील ऐतिहासिक और धार्मिक विषयों पर राजनीतिक बहस की सीमाएं क्या होनी चाहिए।


