हरियाणा के ऐतिहासिक सूरजकुंड में आयोजित होने वाला 39वां सूरजकुंड अंतर्राष्ट्रीय आत्मनिर्भर शिल्प महोत्सव एक बार फिर दुनिया के सांस्कृतिक और पर्यटन मानचित्र पर भारत की मजबूत उपस्थिति दर्ज कराने जा रहा है। यह प्रतिष्ठित महोत्सव न केवल देश-विदेश के कलाकारों, हस्तशिल्पियों और बुनकरों को एक साझा मंच प्रदान करेगा, बल्कि भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और आत्मनिर्भरता के संकल्प को भी वैश्विक स्तर पर प्रदर्शित करेगा।
सूरजकुंड शिल्प महोत्सव को वर्षों से विश्व के सबसे बड़े शिल्प मेलों में गिना जाता रहा है। 39वें संस्करण में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर के कलाकारों की भागीदारी से सांस्कृतिक आदान-प्रदान को नई दिशा मिलने की उम्मीद है। महोत्सव में भारत के विभिन्न राज्यों के साथ-साथ कई विदेशी देशों के शिल्पकार अपनी पारंपरिक कलाओं, हस्तशिल्प और लोककलाओं का प्रदर्शन करेंगे, जिससे आगंतुकों को विविध संस्कृतियों की झलक एक ही स्थान पर देखने को मिलेगी।
इस महोत्सव का प्रमुख उद्देश्य हस्तशिल्पियों और बुनकरों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाना है। आत्मनिर्भर भारत की सोच को आगे बढ़ाते हुए, शिल्प महोत्सव में कारीगरों को सीधे उपभोक्ताओं से जोड़ने का अवसर मिलता है। इससे बिचौलियों की भूमिका कम होती है और शिल्पकारों को अपने उत्पादों का उचित मूल्य प्राप्त होता है। साथ ही, नए व्यापारिक संपर्क और निर्यात के अवसर भी सृजित होते हैं।
सांस्कृतिक कार्यक्रम इस महोत्सव की विशेष पहचान रहे हैं। इस वर्ष भी देश-विदेश के लोकनृत्य, संगीत प्रस्तुतियां और रंगारंग सांस्कृतिक संध्याएं दर्शकों को आकर्षित करेंगी। विभिन्न राज्यों की लोकसंस्कृति, वेशभूषा और खान-पान की झलक महोत्सव को एक सांस्कृतिक उत्सव का रूप देती है। इसके साथ ही, अंतरराष्ट्रीय कलाकारों की प्रस्तुतियां वैश्विक संस्कृति के साथ संवाद को और मजबूत करेंगी।
पर्यटन के दृष्टिकोण से भी सूरजकुंड शिल्प महोत्सव का महत्व अत्यंत है। हर वर्ष लाखों पर्यटक इस आयोजन में शामिल होते हैं, जिससे हरियाणा सहित आसपास के क्षेत्रों में पर्यटन को बढ़ावा मिलता है। होटल, परिवहन, स्थानीय व्यवसाय और सेवाक्षेत्र को इससे सीधा लाभ पहुंचता है। यह महोत्सव भारत को सांस्कृतिक पर्यटन के केंद्र के रूप में स्थापित करने में अहम भूमिका निभा रहा है।
39वें संस्करण में वैचारिक और व्यापारिक गतिविधियों को भी विशेष महत्व दिया गया है। विभिन्न सेमिनार, कार्यशालाएं और संवाद सत्रों के माध्यम से शिल्प, डिजाइन, विपणन और नवाचार पर चर्चा की जाएगी। इससे पारंपरिक शिल्प को आधुनिक बाजार की जरूरतों से जोड़ने में मदद मिलेगी।
कुल मिलाकर, 39वां सूरजकुंड अंतर्राष्ट्रीय आत्मनिर्भर शिल्प महोत्सव भारत की सांस्कृतिक विविधता, शिल्प परंपरा और आत्मनिर्भरता के संकल्प का जीवंत प्रतीक बनेगा। यह आयोजन न केवल कलाकारों और कारीगरों को नई पहचान देगा, बल्कि भारत को वैश्विक सांस्कृतिक और पर्यटन मानचित्र पर और भी मजबूती से स्थापित करेगा।


