हरियाणा की लोक चेतना, सांस्कृतिक विरासत और जन-जीवन की संवेदनाओं को अपनी वाणी से समृद्ध करने वाले महान लोक कवि पंडित दयाचंद मायना जी की पुण्यतिथि पर प्रदेश भर में उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की गई। उनकी रचनाएं न केवल हरियाणवी लोक-संस्कृति की पहचान हैं, बल्कि वे सामाजिक चेतना, नैतिक मूल्यों और मानवीय संवेदनाओं का सशक्त दस्तावेज भी हैं।
पंडित दयाचंद मायना जी का जीवन और साहित्य हरियाणा की मिट्टी से गहराई से जुड़ा रहा। उन्होंने अपनी कविताओं और लोकगीतों के माध्यम से आम जन की पीड़ा, संघर्ष, प्रेम, करुणा और सामाजिक सरोकारों को सरल, सहज और प्रभावशाली शब्दों में अभिव्यक्त किया। उनकी वाणी में लोक जीवन की सच्चाई झलकती थी, जिससे श्रोता स्वयं को उनसे जुड़ा हुआ महसूस करता था।
मायना जी की रचनाओं की विशेषता यह थी कि वे केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि समाज को दिशा देने का कार्य भी करती थीं। उन्होंने अपने काव्य में सत्य, धर्म, श्रम, नारी सम्मान, सामाजिक समरसता और मानवीय मूल्यों को प्रमुखता से स्थान दिया। यही कारण है कि उनकी रचनाएं आज भी प्रासंगिक हैं और आने वाली पीढ़ियों को संस्कार और संवेदना का मार्ग दिखाती रहेंगी।
लोक कवि के रूप में पंडित दयाचंद मायना जी ने हरियाणा की समृद्ध लोक परंपराओं को संरक्षित और प्रचारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उस समय जब आधुनिकता के प्रभाव से लोक संस्कृति के क्षीण होने का खतरा था, तब उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से लोक भाषा, लोक धुनों और पारंपरिक कथ्य को जीवित रखा। उनकी कविताएं गांव-गांव, चौपालों और लोक मंचों पर गाई-सुनाई जाती रहीं और लोगों के हृदय में बस गईं।
पुण्यतिथि के अवसर पर साहित्यकारों, कलाकारों और सामाजिक संगठनों ने उनके योगदान को स्मरण करते हुए कहा कि पंडित दयाचंद मायना जी हरियाणा की आत्मा के कवि थे। उनकी वाणी में न केवल शब्दों की शक्ति थी, बल्कि समाज को जोड़ने और जागरूक करने की क्षमता भी थी। उन्होंने लोक साहित्य को सम्मान दिलाने और उसे मुख्यधारा में लाने का कार्य किया।
आज आवश्यकता है कि उनके साहित्य को संरक्षित कर नई पीढ़ी तक पहुंचाया जाए। विद्यालयों, महाविद्यालयों और सांस्कृतिक मंचों पर उनकी रचनाओं का पाठ और गायन कर युवाओं को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ा जा सकता है। पंडित दयाचंद मायना जी की पुण्यतिथि हमें यह स्मरण कराती है कि लोक साहित्य और संस्कृति किसी भी समाज की आत्मा होती है।
निस्संदेह, पंडित दयाचंद मायना जी का साहित्य हरियाणा की सांस्कृतिक धरोहर के रूप में सदैव जीवित रहेगा। उनकी अमूल्य रचनाएं आने वाली पीढ़ियों को संस्कार, संवेदना और सामाजिक जिम्मेदारी का मार्ग दिखाती रहेंगी और वे हमेशा हरियाणा की लोक चेतना में अमर रहेंगे।


