मेवाड़ की पावन धरा के गौरव, अदम्य साहस और राष्ट्रधर्म के प्रतीक वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप जी की पुण्यतिथि पर आज देशभर में उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित की गई। इस अवसर पर विभिन्न सामाजिक, सांस्कृतिक और राष्ट्रभक्त संगठनों द्वारा कार्यक्रम आयोजित कर उनके शौर्य, त्याग और स्वाभिमान को स्मरण किया गया। महाराणा प्रताप जी भारतीय इतिहास के उन महान योद्धाओं में से हैं, जिनका जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्रोत बना रहेगा।
महाराणा प्रताप का जन्म 9 मई 1540 को कुंभलगढ़ दुर्ग में हुआ था। वे मेवाड़ के सिसोदिया वंश के शासक थे और बचपन से ही स्वाभिमान, वीरता और स्वतंत्रता के मूल्यों में रचे-बसे थे। उन्होंने मुगल सम्राट अकबर की अधीनता स्वीकार करने से स्पष्ट इनकार किया और जीवनभर मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया। हल्दीघाटी का ऐतिहासिक युद्ध उनके अद्वितीय साहस और रणकौशल का सबसे बड़ा प्रमाण है, जहां सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने अत्यंत वीरता के साथ युद्ध किया।
महाराणा प्रताप का जीवन केवल युद्धों तक सीमित नहीं था, बल्कि उनका संपूर्ण संघर्ष राष्ट्र और धर्म की रक्षा के लिए समर्पित था। उन्होंने जंगलों में रहकर, घास की रोटियां खाकर और कठिनतम परिस्थितियों में भी अपने स्वाभिमान से कभी समझौता नहीं किया। उनका घोड़ा चेतक भी भारतीय इतिहास में निष्ठा और बलिदान का प्रतीक बन गया, जिसने अपने प्राणों की आहुति देकर महाराणा प्रताप को सुरक्षित स्थान तक पहुंचाया।
पुण्यतिथि के अवसर पर वक्ताओं ने कहा कि महाराणा प्रताप का जीवन हमें यह सिखाता है कि राष्ट्र की स्वतंत्रता और सम्मान सर्वोपरि है। उनका त्याग केवल एक राजा का त्याग नहीं था, बल्कि वह पूरे समाज और राष्ट्र के लिए था। उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि सच्ची विजय केवल सत्ता से नहीं, बल्कि आत्मसम्मान और धर्मनिष्ठा से प्राप्त होती है।
आज के समय में महाराणा प्रताप जी के विचार और आदर्श और भी अधिक प्रासंगिक हो गए हैं। जब राष्ट्र एकता, आत्मनिर्भरता और सांस्कृतिक गौरव की बात करता है, तब महाराणा प्रताप का जीवन हमें अपने मूल्यों पर अडिग रहने की प्रेरणा देता है। शिक्षण संस्थानों, युवाओं और समाज के हर वर्ग को उनके जीवन से प्रेरणा लेकर राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए।
अंत में, वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप जी की पुण्यतिथि पर उन्हें कोटि-कोटि नमन करते हुए यह संकल्प लिया गया कि उनके दिखाए मार्ग पर चलकर राष्ट्र, संस्कृति और धर्म की रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहेंगे। भारतीय इतिहास के पन्नों में उनकी वीरता और बलिदान सदा स्वर्ण अक्षरों में अंकित रहेंगे।


